भारत में UPI ने डिजिटल पेमेंट्स को आसान, तेज और लगभग बिना किसी अतिरिक्त लागत वाला माध्यम बना दिया है। लेकिन अब इस व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। संसद ने अगस्त 06, 2026, को पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स (संशोधन) विधेयक, 2026, पारित कर दिया है, जिससे सरकार को भविष्य में UPI और RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन्स पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लागू करने का कानूनी अधिकार मिल गया है।
हालांकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में स्पष्ट किया है कि MDR का बोझ ग्राहकों पर नहीं, बल्कि मर्चेंट्स पर होगा। सरकार के अनुसार, इस संशोधन का उद्देश्य फिलहाल केवल कानूनी स्ट्रक्चर तैयार करना है। MDR कब लागू होगा, इसकी दर कितनी होगी और यह किन ट्रांजैक्शन्स पर लागू होगा, इसका फैसला बाद में अधिसूचना के जरिए किया जाएगा।
सरकार MDR को वापस लाने पर क्यों विचार कर रही है?
सरकार का कहना है कि UPI और RuPay पर वर्षों से लागू जीरो MDR व्यवस्था के कारण बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और अन्य डिजिटल पेमेंट कंपनियों के पास नेटवर्क के रखरखाव, सुरक्षा और विस्तार के लिए स्थायी रेवेन्यू स्रोत नहीं है। जैसे-जैसे डिजिटल ट्रांजैक्शन्स की संख्या बढ़ी है, वैसे-वैसे इस पूरे इकोसिस्टम को संचालित करने की लागत भी बढ़ी है। ऐसे में केवल सरकारी प्रोत्साहन पर निर्भर रहना लंबे समय तक व्यवहारिक नहीं माना जा रहा।
इसी वजह से सरकार ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट में संशोधन कर MDR लागू करने का कानूनी आधार तैयार किया है, ताकि भविष्य में आवश्यकता पड़ने पर डिजिटल पेमेंट इकोसिस्टम के लिए एक सस्टेनेबल रेवेन्यू मॉडल बनाया जा सके। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कदम UPI और अन्य कार्ड नेटवर्क के बीच अधिक संतुलित प्रतिस्पर्धा बनाने की दिशा में भी देखा जा रहा है।
किन ट्रांजैक्शन्स पर MDR लागू हो सकता है?
फिलहाल सरकार ने यह तय नहीं किया है कि UPI पर MDR कब लागू होगा और इसकी दर कितनी होगी। पहले सामने आए प्रस्तावों में ₹2,000 से अधिक के UPI ट्रांजैक्शन्स और बड़े मर्चेंट्स पर 0.3% से 0.5% तक MDR लगाने जैसे विकल्पों पर विचार किया गया था।
हालांकि, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि MDR का बोझ ग्राहकों पर नहीं, बल्कि केवल मर्चेंट्स पर होगा। उन्होंने यह भी कहा कि MDR लागू करने पर अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। संसद से पारित संशोधन विधेयक केवल सरकार को भविष्य में MDR लागू करने का कानूनी अधिकार देता है। अंतिम नियम, दर और लागू होने का दायरा सरकार की अधिसूचना के बाद ही स्पष्ट होगा।
₹2,000 की सीमा चर्चा में क्यों आई?
₹2,000 की सीमा इसलिए चर्चा में रही क्योंकि सरकारी स्तर पर जिन शुरुआती प्रस्तावों पर विचार किया गया, उनमें बड़े वैल्यू वाले UPI ट्रांजैक्शन्स पर MDR लगाने का विकल्प शामिल था। रिपोर्ट्स के अनुसार ₹2,000 से अधिक के UPI ट्रांजैक्शन्स कुल लेनदेन की संख्या का केवल लगभग 4% हैं, लेकिन कुल ट्रांजैक्शन वैल्यू का करीब 67% इन्हीं से आता है।
इसी वजह से माना गया कि यदि MDR लागू करना पड़े, तो बड़े वैल्यू वाले ट्रांजैक्शन्स को शामिल करने से अधिकांश छोटे उपभोक्ता प्रभावित नहीं होंगे, जबकि डिजिटल पेमेंट सिस्टम के लिए अतिरिक्त रेवेन्यू का स्रोत तैयार किया जा सकेगा। हालांकि, यह अभी केवल प्रस्तावित विकल्प है, अंतिम नियम नहीं।
डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री पर इसका क्या असर पड़ सकता है?
यदि भविष्य में MDR लागू होता है, तो इससे बैंक, पेमेंट सर्विस प्रोवाइडर्स और डिजिटल पेमेंट कंपनियों को नया रेवेन्यू स्रोत मिल सकता है। इससे पेमेंट नेटवर्क के रखरखाव, साइबर सुरक्षा और नई तकनीकों में निवेश करना आसान हो सकता है।
रॉयटर्स के अनुसार, ब्रोकरेज फर्म जेफरीज का अनुमान है कि प्रस्तावित मॉडल से हर साल ₹50 बिलियन से ₹100 बिलियन तक अतिरिक्त रेवेन्यू उत्पन्न हो सकता है। रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि इससे Paytm, Pine Labs जैसी कंपनियों और बैंकिंग इकोसिस्टम को फायदा मिल सकता है, क्योंकि वर्तमान में UPI पर जीरो MDR होने के कारण उनकी प्रत्यक्ष कमाई सीमित रहती है।
आगे क्या देखना होगा?
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि संसद ने पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स (संशोधन) विधेयक, 2026, पारित कर दिया है और सरकार को UPI तथा RuPay ट्रांजैक्शन्स पर MDR लागू करने का कानूनी अधिकार मिल गया है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि MDR तुरंत लागू हो गया है।
अब सरकार को अलग से अधिसूचना जारी कर यह तय करना होगा कि MDR कब लागू होगा, इसकी दर कितनी होगी, किन मर्चेंट्स पर लागू होगा और किन प्रकार के ट्रांजैक्शन्स इसके दायरे में आएंगे। साथ ही, सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि MDR लागू भी किया जाता है, तो इसका बोझ सीधे ग्राहकों पर नहीं बल्कि मर्चेंट्स पर होगा।
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