2025 के अधिकांश समय में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs) भारतीय इक्विटी मार्केट्स में नेट सेलर्स बने रहे हैं। यह बिकवाली व्यापक रही है, और विशेष रूप से फाइनेंशियल सेक्टर ने इस दबाव को सबसे अधिक महसूस किया है। हालाँकि, इस व्यापक बिकवाली के बीच एक विरोधाभासी और आश्चर्यजनक ट्रेंड देखने को मिल रहा है।
विदेशी पूंजी अब उन कंपनियों की ओर रुख कर रही है जिन्हें डोमेस्टिक निवेशकों ने लंबे समय से छोड़ दिया था। इस वर्ष जनवरी से अब भारत की फाइनेंशियल सर्विसेज कंपनियों में लगभग 15 बिलियन डॉलर का विदेशी निवेश आया है। यह बदलाव केवल आंकड़ों का नहीं है, बल्कि यह भारतीय बैंकिंग और फाइनेंशियल सेक्टर के प्रति ग्लोबल दृष्टिकोण में एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत देता है।
आइए समझे है कि FPIs भारत की संकटग्रस्त कंपनियों में क्यों निवेश कर रहे है और यह स्थिति निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है।
क्या है मामला?
हाल के महीनों, विशेष रूप से अक्टूबर 2025 में, भारतीय बैंकिंग सेक्टर में जिस तरह की बड़ी डील्स देखने को मिली हैं, उन्होंने मार्केट में नई हलचल पैदा की है। विदेशी निवेश अब सिर्फ मजबूत और स्थापित बैंक्स तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन बैंक्स की ओर भी बढ़ रहा है जो हाल के वर्षों में कई चुनौतियों से जूझ रहे थे। जैसे कि RBL बैंक में Emirates NBD का 11,636 करोड़ रुपये का निवेश, फेडरल बैंक में Blackstone का 6,196 करोड़ रुपये और IDFC First Bank में Warburg Pincus व ADIA के संयुक्त रूप से 7,500 करोड़ रुपये के निवेश ने यह साफ कर दिया है कि ग्लोबल पूंजी भारत में शॉर्टटर्म नहीं, बल्कि लॉन्गटर्म रणनीतिक साझेदारी की तलाश में है।
इसके साथ ही, HDFC बैंक में विदेशी स्वामित्व 48.4% और ICICI बैंक में 46.8% तक पहुंच चुका है, जबकि प्राइवेट बैंक्स में विदेशी निवेश की अधिकतम सीमा 74% है। यह अंतर बताता है कि आने वाले वर्षों में इस सेक्टर में और अधिक विदेशी पूंजी के प्रवेश की गुंजाइश बाकी है।
बैंक्स का आंतरिक कायाकल्प और सुधार
हाल के महीनों में भारतीय बैंक्स में विदेशी निवेश जिस तेज़ी से बढ़ा है, उसका असली कारण बाहरी माहौल नहीं, बल्कि इन बैंक्स के भीतर हुआ गहरा और संरचनात्मक बदलाव है। वर्षों तक फंसे हुए कर्ज, कमजोर गवर्नेंस और अस्थिर बैलेंस शीट से जूझने के बाद, कई बैंक्स ने कठिन सफाई प्रक्रिया पूरी की है। यही कारण है कि आज आने वाला ग्लोबल कैपिटल फ्लो किसी आपात राहत की तरह नहीं, बल्कि ग्रोथ और परिवर्तन के भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।
प्रमुख बैंक्स ने अपनी स्थिति को कैसे सुधारा है, इसके कुछ उदाहरण निम्नलिखित हैं:
यस बैंक: 2020 के संकट के बाद, मैनेजमेंट ने एक मल्टी-ईयर रीबिल्ड को अंजाम दिया। बैंक ने 48,000 करोड़ रुपये की तनावग्रस्त एसेट्स को जेसी फ्लावर्स एसेट रिकंस्ट्रक्शन को हस्तांतरित कर दिया और अपना ध्यान रिटेल और MSME ऋण की ओर मोड़ दिया।
IDFC फर्स्ट बैंक: बैंक ने अपने पुराने इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े कॉर्पोरेट ऋण के बोझ को कम किया और रिटेल बैंकिंग पर ध्यान केंद्रित किया। वारबर्ग पिंकस और ADIA का निवेश इसी सुधार का परिणाम है।
RBL बैंक: बैंक ने उच्च जोखिम वाले माइक्रो-बैंकिंग और क्रेडिट कार्ड सेगमेंट में आई चुनौतियों को स्वीकार किया, अपनी अंडरराइटिंग को सख्त किया और सुरक्षित रिटेल ऋण की ओर संतुलन बनाया।
सम्मान कैपिटल: सम्मान कैपिटल, जिसे पहले इंडियाबुल्स हाउजिंग फाइनेंस के नाम से जाना जाता था, ने जोखिम भरे रियल एस्टेट लेंडिंग मॉडल से निकलकर खुद को रिटेल मॉर्टगेज, किफायती आवास और MSME लोन पर केंद्रित एक मजबूत, एसेट-लाइट NBFC में बदल दिया है। यही बदलाव इंटरनेशनल होल्डिंग कंपनी के 8,850 करोड़ रुपये के बड़े निवेश को आकर्षित करने में निर्णायक साबित हुआ।
क्यों भारत में अभी भी अपार बैंकिंग संभावनाएं हैं?
डोमेस्टिक सुधारों के अलावा, ग्लोबल निवेशकों के लिए भारतीय बैंकिंग क्षेत्र का आकर्षण इसके ग्रोथ के आंकड़ों में छिपा है। McKinsey की एक रिपोर्ट के अनुसार, डोमेस्टिक बैंकिंग इंडस्ट्री ने 2024 में 46 बिलियन डॉलर की नेट इनकम अर्जित की, जिसमें 31% की वार्षिक वृद्धि दर्ज की गई। जो इसे दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में से एक बनाता है।
बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) का विश्लेषण बताता है कि भारत में क्रेडिट-टू-GDP रेश्यो कभी भी 1x से ऊपर नहीं गया, जबकि ग्लोबल एवरेज 1.8x है। इसका मतलब है कि भारतीय बैंकिंग में अभी भी भारी अनछुआ विस्तार संभव है और मार्केट saturation से बहुत दूर है। इसके अलावा, UAE आधारित संस्थाओं द्वारा बड़े निवेश पश्चिमी देशों के लिए भी संकेत हैं कि भारत अब पूंजी के लिए पश्चिम पर निर्भर नहीं, बल्कि वैकल्पिक और स्थिर फंडिंग स्रोतों से लैस एक इमर्जिंग आर्थिक शक्ति बन चुका है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
फाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक, जहां पूरा भारतीय शेयर मार्केट फॉरवर्ड अर्निंग के 23x पर ट्रेड हो रहा है जो महंगा माना जाता है वहीं फाइनेंशियल कंपनियां सिर्फ 17x पर उपलब्ध हैं। इसका मतलब है कि यह सेक्टर अभी भी तुलनात्मक रूप से सस्ता है और लंबी अवधि के निवेशकों के लिए एक बेहतर एंट्री पॉइंट बन सकता है।
Dealogic के डेटा से पता चलता है कि विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक भारतीय बैंकिंग डील्स में 8 बिलियन डॉलर का निवेश किया है। यह आंकड़ा 2024 के 2.3 बिलियन डॉलर और 2023 के 1.4 बिलियन डॉलर की तुलना में कई गुना अधिक है, जो क्षेत्र में बढ़ते भरोसे को दर्शाता है। इसके साथ ही, कई पुराने प्राइवेट बैंक्स का प्राइस-टू-बुक रेश्यो केवल 0.7x है, जो उन्हें वैल्यू स्टॉक्स बनाता है।
भविष्य की बातें
भारतीय बैंकिंग सेक्टर में विदेशी रुचि इसलिए बढ़ रही है क्योंकि क्रेडिट की डिमांड लॉन्ग टर्म तक मजबूत रहने वाली है। फाइनेंशियल टाइम्स के अनुसार, Emkay Global के यतिन सिंह कहते हैं, कि किसी भी लेंडिंग सेगमेंट को उठाइए अगले 15-25 साल अवसर ही अवसर हैं और भारत में बैंक खरीदना अक्सर 50-साल की नज़र से लिया गया फैसला होता है।
ट्रेंड भी साफ है भारत के विभिन्न लेंडर्स ने मुश्किल दौर झेला है, जोखिम को पार कर बैलेंस शीट सुधारी और वैल्यूएशन नीचे आ गए। अब इन्हीं सुधारों पर विदेशी पूंजी ग्रोथ और ट्रांसफॉर्मेशन के रूप में दांव लगा रही है। लेकिन जोखिम भी मौजूद हैं। संस्कृति बदलने में समय लगता है, और इन संस्थानों को साबित करना होगा कि नए बिज़नेस मॉडल अगली क्रेडिट साइकिल झेल पाएंगे।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर