कुछ अमीर भारतीयों के लिए क्रेडिट कार्ड रिन्यूअल अब रेगुलेटरी सिरदर्द बन गया है। एशिया के कुछ हिस्सों के ऑफशोर बैंक रेजिडेंट इंडियंस को इंटरनेशनल क्रेडिट कार्ड देने से कतरा रहे हैं। वजह ग्राहक का क्रेडिट स्कोर नहीं, बल्कि भारत का LRS 180-दिन डिप्लॉयमेंट नियम है।
आइए LRS के 180-दिन वाले नियम को विस्तारपूर्वक समझें और जानें कि इससे विदेशी क्रेडिट कार्ड इस्तेमाल करने वाले भारतीयों को कितना नुकसान हो सकता है।
क्या है मामला?
कई ऑफशोर बैंक रेजिडेंट इंडियंस को इंटरनेशनल क्रेडिट कार्ड जारी करने या रिन्यू करने से इनकार कर रहे हैं। द इकनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ज्यूरिख, सिंगापुर, लंदन और पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों में ये बैंक अमीर भारतीय क्लाइंट्स के लिए ऐसे कार्ड्स बंद कर रहे हैं।
एक्सपायर हो चुके या रिन्यूअल के करीब पहुंच चुके कार्ड्स इस समस्या की चपेट में हैं। दरअसल, मामले की जड़ में 2022 में लाया गया वो नियम है, जब RBI ने LRS के तहत ओवरसीज इन्वेस्टमेंट नॉर्म्स में बड़ा बदलाव किया था।
खास बात यह है कि कस्टमर्स की क्रेडिटवर्थिनेस में कोई गिरावट नहीं आई है। रेगुलेटरी पाबंदी की वजह से विदेश में अनयूज्ड पैसा रखना मुश्किल हो रहा है, जो बैंक्स के लिए बुनियादी बैंकिंग संबंध को जटिल बना रहा है।
180-दिन का नियम क्या कहता है?
LRS के तहत रेजिडेंट इंडियंस हर फाइनेंशियल ईयर में $250,000 तक विदेश भेज सकते हैं। लेकिन इन पैसों पर शर्त है कि उन्हें 180 दिनों के अंदर खर्च या इन्वेस्ट करना होगा, वरना अनयूज्ड रकम वापस भारत लानी पड़ेगी।
ओवरसीज सेविंग्स या चेकिंग अकाउंट में पैसा रखना डिप्लॉयमेंट नहीं माना जाता, और विदेशी बैंक में फिक्स्ड डिपॉजिट करना भी इस शर्त को पूरा नहीं करता। सिक्योरिटीज या प्रॉपर्टी खरीदना और होटल बुकिंग, हवाई टिकट और रेस्टोरेंट बिल जैसे करंट-अकाउंट खर्च ही डिप्लॉयमेंट की श्रेणी में आते हैं।
खेतान एंड कंपनी के पार्टनर मोइन लाढ़ा ने द इकनॉमिक टाइम्स को बताया कि यह नियम भारतीय परिवारों के ओवरसीज बैंकिंग संबंधों का ‘अनइंटेंडेड कॉन्सीक्वेंस’ बन रहा है। रेजिडेंट्स के पास विदेश में बैलेंस रखने की सीमित गुंजाइश है, इसलिए कुछ इंटरनेशनल बैंक इन अकाउंट्स से जुड़े क्रेडिट कार्ड देने से हिचक रहे हैं।
विदेशी क्रेडिट कार्ड क्यों हैं खास?
फॉरेन-इश्यू इंटरनेशनल क्रेडिट कार्ड्स का सबसे बड़ा फायदा यह है कि खर्च उसी करेंसी में होता है, जिसमें ट्रांजैक्शन किया जाता है। इससे करेंसी कन्वर्जन चार्जेज बचते हैं, जो भारतीय बैंक्स के कार्ड्स पर लगते हैं।
PR भुटा एंड कंपनी के पार्टनर हर्षल भुटा के मुताबिक, FEMA के तहत ऐसे विदेशी कार्ड्स की देनदारी चुकाने के लिए भारत से रेमिटेंस की कोई तय मौद्रिक सीमा नहीं है। असली लिमिट विदेशी बैंक या कार्ड ऑपरेटर की तय की गई क्रेडिट लिमिट ही है। साथ ही, RBI गाइडेंस में विदेशी कार्ड के बिल का सेटलमेंट LRS रेमिटेंस नहीं माना जाता, इसलिए ये खर्च TCS फ्रेमवर्क से बाहर रह सकते हैं।
FATCA और अन्य डेटा-एक्सचेंज समझौतों के तहत भी विदेशी ज्यूरिस्डिक्शन भारत के साथ इंटरनेशनल क्रेडिट कार्ड के खर्च की जानकारी अपने आप साझा नहीं करते। इसका मतलब यह नहीं कि ये खर्च भारतीय टैक्स या रेगुलेटरी दायरे से बाहर हैं, लेकिन यही वजह है कि विदेशी कार्ड्स की संरचना भारतीय बैंक्स के कार्ड्स से अलग है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
यह मुद्दा उन रेजिडेंट इंडियंस के लिए सबसे अहम है जो विदेशी अकाउंट रखते हैं या ऑफशोर बैंक्स के इंटरनेशनल कार्ड इस्तेमाल करते हैं। LRS के तहत पैसा भेजना अब भी कानूनी है, लेकिन पैसा विदेश में बेकार नहीं पड़ा रह सकता। कार्ड जारी करने या रिन्यू करने का फैसला अब सिर्फ क्रेडिट प्रोफाइल पर नहीं, बल्कि इस पर निर्भर करेगा कि पूरी ओवरसीज बैंकिंग रिलेशनशिप भारत की रिमिटेंस नियमों में फिट बैठती है या नहीं।
UAE बेस्ड NRIs के लिए राहत की बात है कि यह नियम उन पर लागू नहीं होता। FEMA के तहत “पर्सन रेजिडेंट इन इंडिया” पर लागू होने वाली यह 180-दिन की शर्त NRI की विदेशी कमाई पर नहीं चलती, NRI अपनी UAE सेलरी और सेविंग्स बिना किसी डेडलाइन के UAE बैंक अकाउंट्स में रख सकते हैं। वहीं NRO अकाउंट से सालाना $1 मिलियन तक रेमिटेंस की अलग व्यवस्था है, जिस पर 180-दिन वाली शर्त ऑटोमैटिकली लागू नहीं होती।
भविष्य की बातें
फिलहाल यह समस्या कुछ अमीर ग्राहकों और खास ओवरसीज बैंकिंग रिलेशनशिप तक सीमित है, यह इंटरनेशनल क्रेडिट कार्ड्स पर कोई ब्लैंकेट बैन नहीं है। लेकिन जैसे-जैसे ग्लोबल बैंक कंप्लायंस को लेकर सतर्क हो रहे हैं, रिच इंडियंस के लिए विदेशी कार्ड तक पहुंच सीमित हो सकती है और ओवरसीज बैंकिंग ऑप्शन्स कम हो सकते हैं।
खेतान एंड कंपनी के पार्टनर मोइन लाढ़ा का कहना है कि 180-दिन की शर्त में खासकर माइनर्स के लिए थोड़ी फ्लेक्सिबिलिटी इन प्रैक्टिकल समस्याओं को हल कर सकती है। वहीं जयन्तीलाल ठक्कर एंड कंपनी के पार्टनर राजेश शाह का मानना है कि माइनर्स की रिमिटेंस पर स्थिति फरवरी 2004 में LRS की शुरुआत से अपरिवर्तित है, और उन्होंने नॉन-अर्निंग फैमिली मेंबर्स के जरिये ज्यादा पैसा भेजे जाने की अनकन्फर्म्ड चिंताओं का भी जिक्र किया।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।