भारत में मानसून का आगमन एक ऐसा इवेंट है जो देश की कृषि और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डालता है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) की हालिया अनुमान के अनुसार, जुलाई में भारत में औसत से अधिक बारिश की संभावना है। यह खबर न केवल किसानों बल्कि पूरे देश के लिए अहम् हो जाती है, क्योंकि कृषि और मौसम का सीधा संबंध है।
इस आर्टिकल में, हम मानसून के एग्रीकल्चर सेक्टर और व्यापक अर्थव्यवस्था पर प्रभाव, निवेशकों के लिए अवसर, और आगे की संभावनाओं पर चर्चा करेंगे।
क्या है मामला?
जून का महीना देश के लिए मानसून की बारिश के लिहाज से थोड़ा निराशाजनक रहा, क्योंकि आंकड़ों के अनुसार, जून में पूरे देश में औसत से 11% कम बारिश हुई, जो पिछले 5 सालों में सबसे ज़्यादा है। हालांकि, जुलाई महीने के लिए IMD का अनुमान के अनुसार, पूरे देश में औसत से ज़्यादा बारिश होने की 80% संभावना जताई जा रही है। वहीं, कृषि के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले मानसून के मुख्य क्षेत्र में भी औसत से ज़्यादा बारिश का अनुमान है। इससे उम्मीद जगी है कि जुलाई की अच्छी बारिश जून की कमी को पूरा कर सकेगी, और जुलाई के पहले सप्ताह से ही हमें यह नजारा दिखना शुरु हो चुका है।
ज्यादा बारिश का अनुमान और किसानों में उम्मीद
जून के महीने में कम बारिश के बावजूद, इस साल खरीफ फसलों की बुवाई ने रिकॉर्ड बनाया है। 30 जून को जहां पूरे देश में बारिश 11% कम थी, वहीं 8 जुलाई को आते-आते 2% ज़्यादा हो गई। इस बदलाव का असर हमें खरीफ फसलों की बुवाई पर देखने को मिला, कृषि मंत्रालय द्वारा 8 जुलाई 2024 को जारी नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि 5 जुलाई 2024 तक खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल के मुकाबले 14% ज़्यादा हो गयी है और अभी तक 378 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर बुवाई हो चुकी है, जो पिछले साल से 47 लाख हेक्टेयर ज़्यादा है।
सिर्फ इतना ही नहीं, दलहन और तिलहन की बुवाई में 50% की बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि पानी की ज़्यादा ज़रूरत वाली धान की खेती में सिर्फ 19% का इजाफा हुआ है। ये आंकड़े बताते हैं कि किसान कम बारिश के बावजूद खेती के लिए उत्साहित हैं।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
भारत न सिर्फ कृषि प्रधान देश है, बल्कि ग्लोबल कृषि क्षेत्र में भी एक प्रमुख प्लेयर है और लगभग 55% भारतीय आबादी की आजीविका का मुख्य स्रोत कृषि ही है। अनुमानों की बात करें तो, Inc42 के अनुसार, भारतीय कृषि क्षेत्र 2025 तक बढ़कर 24 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है।
इतना ही नहीं, फ़ूड और ग्रोसरी का भारतीय मार्केट दुनिया का छठा सबसे बड़ा मार्केट है, जिसमें रिटेल सेल्स का 70% योगदान है। ये आंकड़े भारत की कृषि क्षमता और इस क्षेत्र में निवेश के भविष्य की संभावनाओं को दर्शाते हैं।

यह टेबल बीते वर्षों में एग्रीकल्चर सेक्टर से जुडी कुछ कंपनियों के प्रदर्शन को दर्शाता है।
भविष्य की बातें
मानसून का असर सिर्फ खरीफ की फसलों जैसे कि धान, दलहन और तिलहन पर ही नहीं पड़ता। बल्कि, अच्छी बारिश ज़मीन में पर्याप्त नमी बनाए रखती है, जो रबी की फसलों जैसे कि गेहूँ, जौ, चना, मसूर, मटर व सरसों आदि की बुवाई के लिए भी ज़रूरी होती है। दरअसल, देश के लगभग आधे खेत मानसून पर ही निर्भर करते हैं।
अगर जुलाई में वाकई में अच्छी बारिश होती है, तो इससे न सिर्फ खरीफ की फसलें अच्छी होंगी बल्कि रबी की बुवाई के लिए भी ज़मीन तैयार हो जाएगी। इतना ही नहीं, कृषि मंत्रालय के मुताबिक इस साल खरीफ सीजन में प्याज, टमाटर और आलू जैसी प्रमुख सब्जियों की बुवाई का रकबा पिछले साल के मुकाबले काफी बढ़ गया है जिससे अच्छी बारिश के चलते खाद्य पदार्थों की कीमतों को नियंत्रित करने और निर्यात को फिर से बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
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*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
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