भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने SME (स्माल एंड मीडियम इंटरप्राइजेज) प्लेटफॉर्म के लिए नए नियम प्रस्तावित किए हैं। इनका उद्देश्य SME कंपनियों के जरिए कैपिटल मार्केट को पारदर्शी और निवेशकों के लिए सुरक्षित बनाना है। इन प्रस्तावों का मुख्य फोकस SME IPOs के लिए न्यूनतम सब्सक्रिप्शन सीमा को ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख करना है। आइए अन्य प्रस्ताव को भी विस्तार से समझते हैं।
क्या है मामला?
19 नवंबर 2024 को सेबी द्वारा एक रिपोर्ट जारी की गयी है, जिसमें SME IPOs में रिटेल निवेशकों की बढ़ती भागीदारी को ध्यान में रखते हुए न्यूनतम सब्सक्रिप्शन सीमा को दोगुना करने का प्रस्ताव रखा है। जहां SME IPOs के लिए न्यूनतम आवेदन राशि को ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख किया जा सकता है। एक अन्य सुझाव में इसे ₹4 लाख तक बढ़ाने की भी बात कही गई है।
सेबी का मानना है कि SME IPOs में जोखिम का स्तर काफी अधिक होता है और कंपनी लिस्ट होने के बाद मार्केट में नेगेटिव सेंटीमेंट्स आने पर निवेशक फंस सकते हैं। इसलिए, छोटे निवेशकों को ऐसे जोखिमों से बचाने के लिए न्यूनतम निवेश सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव है, हालांकि 4 दिसंबर 2024 तक इसके संबंध में पब्लिक अपनी राय दे सकती है।
SME बढ़ता ट्रेंड और कुछ चुनौतियां
NSE और BSE के SME एक्सचेंज पर अब तक कुल 1,089 कंपनियां लिस्ट हो चुकी हैं, जिनमें से 322 कंपनियां मेन बोर्ड पर माइग्रेट हो चुकी हैं। 15 अक्टूबर 2024 तक, NSE के SME एक्सचेंज पर 417 कंपनियां और BSE पर 328 कंपनियां लिस्टेड थीं, जिनका संयुक्त मार्केट कैपिटलाइजेशन लगभग ₹2 लाख करोड़ है।
हालांकि, इन उपलब्धियों के साथ कुछ चुनौतियां भी बनी हुई हैं। NSE पर 12 कंपनियां निलंबित हैं और 15 कंपनियों में पिछले महीने कोई ट्रेडिंग नहीं हुई। इसी प्रकार, BSE पर 28 कंपनियां निलंबित हैं और 35 में ट्रेडिंग नहीं हुई। यह डेटा SME IPOs में सुधारने की आवश्यकता को दर्शाता है।
सेबी के अन्य प्रस्ताव
NII (नॉन-इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स) श्रेणी का पुनर्गठन: NII श्रेणी को दो हिस्सों में बांटने का प्रस्ताव है। पहले हिस्से में ₹10 लाख तक के आवेदनों के लिए 1/3 आवंटन और दूसरे हिस्से में ₹10 लाख से अधिक के आवेदनों के लिए 2/3 आवंटन होगा।
OFS (ऑफर फॉर सेल) की सीमा तय करना: प्रस्तावित सीमा के अनुसार, SME IPO में OFS को इश्यू साइज के अधिकतम 20% तक सीमित किया जाए। साथ ही, प्रमोटर्स द्वारा उनके प्री-इश्यू शेयरहोल्डिंग का भी अधिकतम 20% तक ऑफर करने का सुझाव दिया गया है।
GCP (जनरल कॉर्पोरेट पर्पज) की सीमा: GCP राशि को इश्यू साइज के 10% या ₹10 करोड़ (जो भी कम हो) तक सीमित करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, अनियोजित अधिग्रहण के लिए धन जुटाने की अनुमति को भी समाप्त करने का सुझाव दिया गया है।
प्रमोटर शेयर लॉक-इन अवधि बढ़ाना: प्रमोटर्स के न्यूनतम योगदान पर लॉक-इन अवधि को 3 साल से बढ़ाकर 5 साल करने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, अतिरिक्त होल्डिंग के लिए लॉक-इन अवधि को चरणबद्ध तरीके से जारी किया जाएगा, जिसमें 50% एक साल बाद और शेष 50% दो साल बाद जारी होगा।
पब्लिक कमेंट्स के लिए DRHP का प्रकाशन: SME IPO के ड्राफ्ट रेड हेरिंग प्रॉस्पेक्टस (DRHP) को 21 दिनों के लिए सार्वजनिक राय के लिए उपलब्ध कराने का सुझाव दिया गया है। यह DRHP स्टॉक एक्सचेंज और संबंधित लीड मैनेजर्स की वेबसाइट पर प्रकाशित किया जाएगा, और इसकी सूचना अंग्रेजी, हिंदी और क्षेत्रीय भाषा में में दी जाएगी।
निष्कर्ष
इन प्रस्तावों का मुख्य उद्देश्य SME सेगमेंट में पारदर्शिता बढ़ाना, निवेशकों की सुरक्षा करना, और स्टॉक एक्सचेंज पर उच्च गुणवत्ता वाली कंपनियों की भागीदारी सुनिश्चित करना है, जिससे रिटेल निवेशक ऐसे SME स्टॉक्स में निवेश से बच जाएं, जिन्हे वह एग्जिट भी कर न पाएं।
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*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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