सेबी ने डेरिवेटिव्स ट्रेडिंग को लेकर 24 फरवरी 2025 को एक सर्कुलर जारी किया है जिसमें बड़े निवेशकों द्वारा सस्ते और कम डेल्टा वाले ऑप्शंस में निवेश कर ओपन इंटरेस्ट (OI) को कृत्रिम रूप से बढ़ाने और बड़े निवेशकों द्वारा स्टॉक्स को बैन पीरिएड में धकेलने की घटनाओं को उजागर किया है।
इस समस्या को हल करने के लिए सेबी ने नए नियमों का प्रस्ताव दिया है। आइए समझते है कि यह नए नियम क्या है और निवेशकों के लिए क्या मायने रखते है।
क्या है मामला?
पहले के नियमों के तहत, डेरिवेटिव्स मार्केट में ओपन इंटरेस्ट (OI) की गणना नोशनल वैल्यू (Notional Value) के आधार पर की जाती थी। हालांकि, कंसल्टेशन पेपर स्टॉक्स के लिए ओपन इंटरेस्ट की गणना के तरीके को बदलने का सुझाव देता है। वर्तमान में, यह F&O ट्रेड्स के नोशनल वैल्यू पर आधारित है। यह तरीका मार्केट वाइड पोजीशन लिमिट (MWPL) को 95% तक जल्दी पहुंचा देता है, जिससे स्टॉक पर F&O बैन जल्दी लग जाता है।
नए नियम: डेल्टा-आधारित OI सिस्टम
सेबी ने OI की गणना के तरीके को बदलने का प्रस्ताव रखा है। पहले OI को केवल नोशनल वैल्यू के आधार पर मापा जाता था, लेकिन अब इसे डेल्टा-वेटेड तरीके से मापा जाएगा।
उदाहरण के लिए, यदि किसी OTM कॉल ऑप्शन की प्राइस ₹100 रुपये है और उसका डेल्टा 0.1 है, तो OI की गणना में अब केवल ₹10 ही जोड़ा जाएगा, न कि पूरा ₹100, इससे OI में कृत्रिम वृद्धि को रोकने में मदद मिलेगी और मार्केट अधिक स्थिर होगा।
डेल्टा का महत्व और नए नियमों का प्रभाव
डेल्टा यह मापता है कि किसी ऑप्शन की प्राइस उनके अंडरलाइंग स्टॉक के मुकाबले कितनी बदलती है।
उदाहरण के लिए, यदि किसी ऑप्शन का डेल्टा 0.5 है और स्टॉक की प्राइस ₹10 बढ़ती है, तो ऑप्शन की प्राइस ₹5 बढ़ेगी।
इस बदलाव के कारण, सेबी द्वारा 1 जुलाई 2024 से 30 सितम्बर 2024 के बीच किए गए बैक-टेस्टिंग में पाया गया कि बैन पीरियड के मामलों में 90% से ज्यादा की कमी आई। पुराने नियमों के तहत 366 मामलों में स्टॉक्स बैन हुए थे, जबकि नए नियम लागू होने पर यह संख्या घटकर मात्र 27 रह गई। इससे न केवल मार्केट की अस्थिरता कम होगी, बल्कि स्टॉक प्राइस को हेरफेर करने में मुश्किल आएगी।
रियल-टाइम मॉनिटरिंग से बढ़ेगी पारदर्शिता
पहले, OI की निगरानी केवल दिन में एक बार की जाती थी, जिससे कुछ बड़े निवेशक दिन के दौरान OI में कृत्रिम वृद्धि कर सकते थे। अब, सिस्टमेटिक और सेटलमेंट जोखिम को मैनेज करने के लिए, क्लीयरिंग कॉर्पोरेशन द्वारा सिंगल स्टॉक्स के लिए MWPL उपयोग (FutEq के संदर्भ में) को दिन में कम से कम चार बार रैंडम तरीके से मॉनिटर किया जाएगा। इन रीडिंग्स को मार्केट के सभी प्रतिभागियों के साथ साझा किया जाएगा। यह कदम मार्केट में पारदर्शिता बढ़ाने और जोखिम को नियंत्रित करने में मददगार साबित होगा।
साथ ही, मार्केट में कोई भी निवेशक दिन के दौरान OI को अचानक नहीं बढ़ा सकता है। इसके अलावा, रियल-टाइम डेटा उपलब्ध होगा, जिससे निवेशकों को अपनी रणनीति को तेजी से एडजस्ट करने में मदद मिलेगी।
प्री-ओपन और पोस्ट-क्लोज़ सेशन का लाभ
सेबी ने अब प्री-ओपन और पोस्ट-क्लोज़ सेशन को भी डेरिवेटिव्स के लिए लागू करने का प्रस्ताव रखा है। पहले यह सुविधा केवल कैश मार्केट में थी, लेकिन अब इसे फ्यूचर्स और ऑप्शंस मार्केट के लिए भी जोड़ने का विचार है।
यह बदलाव प्राइस डिस्कवरी को बेहतर करने और इन अवधियों के दौरान अचानक होने वाले उतार-चढ़ाव को कम करने में मदद करेगा, जिससे निवेशकों को अपनी स्ट्रेटेजीज को एक्सीक्यूट करने का बेहतर अवसर मिलेगा।
नॉन-बेंचमार्क इंडेक्स में हेरफेर रोकने के लिए नए नियम
सेबी ने सेक्टरल और थीमैटिक इंडेक्स के लिए भी नए मानक तैयार किए हैं, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि मार्केट में कोई भी एक स्टॉक अत्यधिक प्रभावी न हो।
नए नियमों के अनुसार, किसी इंडेक्स में कम से कम 14 स्टॉक्स होने चाहिए, और सबसे बड़े स्टॉक का वेटेज 20% से अधिक नहीं होना चाहिए। इसके अलावा, टॉप 3 स्टॉक्स का संयुक्त वेटेज 45% से अधिक नहीं हो सकता। इससे यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी बड़ी कंपनी पूरे इंडेक्स को नियंत्रित न कर सके।
सेबी को भेजें अपनी प्रतिक्रिया
सेबी ने इन सभी प्रस्तावों पर 17 मार्च 2025 तक सार्वजनिक सुझाव मांगे हैं। यदि आप डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग करते हैं, मार्केट में हेरफेर से परेशान हैं, या मार्केट को अधिक स्थिर और पारदर्शी बनाने की इच्छा रखते हैं, तो सेबी की आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर अपनी राय दें सकते है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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