भारत में तेजी से बढ़ता शहरीकरण और बदलती जीवनशैली ने को-लिविंग सेक्टर को रियल एस्टेट का एक इमर्जिंग सेगमेंट है। यह सेक्टर लोगो न केवल किफायती और सुविधाजनक आवास का समाधान प्रदान कर रहा है, बल्कि युवा प्रोफेशनल्स, छात्रों और प्रवासियों के लिए सामुदायिक जीवन का एक नया तरीका भी पेश कर रहा है।
को-लिविंग की बढ़ती डिमांड और निवेशकों की रुचि ने इसे भारत के सबसे तेजी से विकसित होने वाले क्षेत्रों में से एक बना दिया है। आइए, इस सेक्टर की वृद्धि, इसके पीछे के कारण, निवेश के अवसरों और भविष्य के परिदृश्य को समझते हैं।
क्या है मामला?
भारत में को-लिविंग सेक्टर फिलहाल शुरुआती चरण में है, जहां संगठित रूप से केवल 3 लाख बेड्स की इन्वेंट्री है, जो कुल संभावित डिमांड का सिर्फ 5% हिस्सा है।
हालांकि, रिपोर्ट कोलियर्स (Colliers) के अनुसार यह इन्वेंट्री 2030 तक बढ़कर 10 लाख बेड्स तक पहुंच सकती है। इससे को-लिविंग सेक्टर की हिस्सेदारी 5% से बढ़कर 10% से अधिक हो सकती है।
यह ग्रोथ शहरीकरण, युवाओं की बढ़ती आबादी और मेट्रो शहरों में जॉब के अवसरों के कारण हो रही है। खासकर मिलेनियल्स और जेन Z की प्राथमिकता अब पारंपरिक PG या फ्लैट्स की बजाय सुविधाजनक और साझा रहने के तरीकों की ओर बढ़ रही है।
को-लिविंग सेक्टर क्यों हो रहा है लोकप्रिय?
तेज़ी से बढ़ती डिमांड: कोविड-19 के बाद को-लिविंग सेक्टर में फिर से तेजी आई है। 2025 तक को-लिविंग बेड्स की डिमांड 6.6 मिलियन तक पहुंचने की संभावना है, जो 2030 तक 9.1 मिलियन हो सकती है।
कम उपलब्धता, बड़ी संभावना: अभी संगठित क्षेत्र में सिर्फ 3 लाख बेड्स हैं, जो कुल डिमांड का केवल 5% है। यह 2030 तक 1 मिलियन बेड्स तक बढ़ सकता है, जिससे पेनेट्रेशन 10%+ हो सकती है।
शहरी माइग्रेशन और युवाओं की जरूरत: शिक्षा और रोजगार के लिए शहरों का रुख करने वाले 20-34 वर्ष के लगभग 5 करोड़ माइग्रेंट्स को सुविधाजनक रेंटल हाउसिंग की आवश्यकता है।
छात्रों के लिए भारी डिमांड-सप्लाई गैप: उच्च शिक्षा में नामांकन बढ़कर 4.33 करोड़ हो गया है, लेकिन कॉलेज/यूनिवर्सिटीज़ सिर्फ 4 मिलियन छात्रों को ही आवास दे पा रही हैं, जबकि 2025 तक 12 मिलियन छात्रों को छात्र-आवास की जरूरत होगी।
भारत के शहरी रेंटल मार्केट में बदलाव
पारंपरिक किराए के मुकाबले को-लिविंग सस्ता, फ्लेक्सिबल और ज्यादा सुविधाजनक विकल्प साबित हो रहा है। बेंगलुरु, मुंबई, दिल्ली-NCR और हैदराबाद जैसे महानगरों में को-लिविंग स्पेस का किराया पारंपरिक 1BHK के मुकाबले 20-35% तक कम है।
उदाहरण के लिए, बेंगलुरु में को-लिविंग में सिंगल ऑक्यूपेंसी का औसत किराया ₹11,700 से ₹23,700 प्रति महीने है, जबकि पारंपरिक 1BHK का ₹15,500 से ₹36,500 तक जाता है। इतना ही नहीं, को-लिविंग में बिजली-पानी, वाई-फाई, सफाई और मेंटेनेंस जैसी सुविधाएं पहले से ही किराए में शामिल होती हैं, जिससे अलग से बिल भरने की परेशानी नहीं उठानी पड़ती है। साथ ही, फ्लेक्सिबल लीज टर्म्स और कम डिपॉजिट इसे युवा पेशेवरों और स्टूडेंट्स के लिए आदर्श विकल्प बनाते हैं।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
भारत का को-लिविंग सेक्टर निवेशकों के लिए आकर्षक अवसर बनकर उभरा है। 2015 के बाद से इस क्षेत्र में $1 बिलियन से अधिक का निवेश हुआ है, जिसकी वजह है इसके 10% तक के आकर्षक रिटर्न्स – पारंपरिक रियल एस्टेट के 2-5% रिटर्न की तुलना में कहीं ज्यादा। इस निवेश ने ऑपरेटर्स को तेजी से विस्तार करने और सेवाओं को बेहतर बनाने का मौका दिया है।

कोलियर्स इंडिया के नेशनल डायरेक्टर विमल नादर के अनुसार, “तेजी से बढ़ता यह सेक्टर और इसकी अभी भी अधूरी संभावनाएं, इसे भारतीय रियल एस्टेट में एक आकर्षक निवेश विकल्प बनाती हैं।” अब यह ट्रेंड टियर-1 शहरों से आगे बढ़कर इंदौर, जयपुर, कोयंबटूर, चंडीगढ़, विशाखापट्टनम और देहरादून जैसे टियर-2 शहरों तक पहुंच रहा है।
भविष्य की बातें
भारत में को-लिविंग सेक्टर तेजी से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, वर्तमान में को-लिविंग बेड्स की डिमांड 66 लाख है, जो 2030 तक बढ़कर 91 लाख तक पहुंचने का अनुमान है। ₹4,000 करोड़ के इस मार्केट के 2030 तक ₹20,000 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है – यानी पांच गुना से अधिक की वृद्धि।
कोलियर्स इंडिया के CEO बादल याग्निक के अनुसार, “तेजी से हो रहे शहरीकरण और छात्रों व युवा पेशेवरों जैसे प्रवासी आबादी के उच्च अनुपात के कारण, संगठित किराये के आवास, विशेष रूप से को-लिविंग, की डिमांड में मजबूत वृद्धि देखने को मिलेगी।”
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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