भारत के बड़े शहरों में रेजिडेंशियल प्रॉपर्टीज ने 2019 के बाद से डबल रिटर्न दिया है। ANAROCK रिसर्च के मुताबिक, प्राइसेस में 125% तक की बढ़ोतरी हुई है, वहीं रेंटल यील्ड्स में भी 100 बेसिस पॉइंट्स तक का सुधार आया है। यानी घर अब सिर्फ कैपिटल वैल्यू में ही नहीं, बल्कि कैश फ्लो में भी मजबूत रिटर्न दे रहे हैं।
आइए रेंटल यील्ड के इस बदलते ट्रेंड को विस्तारपूर्वक समझें और जानें क्या यह प्रॉपर्टी इन्वेस्टर्स के लिए एक बड़ा निवेश अवसर बन सकता है।
क्या है रेंटल यील्ड?
रेंटल यील्ड वह आंकड़ा है जो बताता है कि प्रॉपर्टी की कुल वैल्यू के मुकाबले उससे सालाना कितनी रेंटल इनकम मिल रही है। इसे निकालने का फॉर्मूला सरल है, सालाना रेंटल इनकम को प्रॉपर्टी की वैल्यू से भाग देकर 100 से गुणा कर दीजिए। मिसाल के तौर पर, अगर ₹80 लाख की प्रॉपर्टी से ₹25,000 मासिक किराया मिलता है, तो सालाना ₹3 लाख की इनकम पर रेंटल यील्ड करीब 3.75% बनती है।
भारतीय शहरों में रेंटल यील्ड एक जैसी नहीं रहती, यह शहर, लोकेशन और प्रॉपर्टी टाइप पर निर्भर करती है। मुंबई और दिल्ली जैसे महानगरों में प्रॉपर्टी प्राइसेस बेहद हाई होने की वजह से यील्ड आमतौर पर कम रहती है, जबकि बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे शहरों में हाई डिमांड की वजह से यील्ड ज्यादा मिलती है। वहीं, ट्रांसपोर्ट, कॉलेजों या बिजनेस डिस्ट्रिक्ट्स की नजदीकी वाली माइक्रो-मार्केट्स में भी रेंटल यील्ड काफी हाई हो सकती है। प्रॉपर्टी टाइप की बात करें तो अपार्टमेंट्स आमतौर पर ज्यादा यील्ड देते हैं, क्योंकि उनकी लागत कम होती है और टेनेंट्स भी आसानी से मिल जाते हैं।
किन शहरों में मिला है डबल रिटर्न?
देश के टॉप 11 हाउसिंग मार्केट्स पर हुए ANAROCK रिसर्च के विश्लेषण में नोएडा सबसे बड़ा वेल्थ क्रिएटर बनकर उभरा है। नोएडा में औसत रेजिडेंशियल प्राइसेस 2019 के ₹4,795 प्रति वर्ग फुट से बढ़कर 2026 की Q2 में ₹10,780 प्रति वर्ग फुट हो गए, यानी 125% की ग्रोथ, जबकि रेंटल यील्ड 3.2% से बढ़कर 3.9% पहुंची। गुरुग्राम में प्रॉपर्टी प्राइसेस 117% बढ़कर ₹6,150 से ₹13,350 प्रति वर्ग फुट हो गए और रेंटल यील्ड 3.5% से मजबूत होकर 4.3% पर पहुंच गई।
बेंगलुरु और हैदराबाद ने रेंटल ग्रोथ में सबसे अच्छा प्रदर्शन किया है। दोनों शहरों में 2019 से Q2 2026 के बीच रेंटल यील्ड में 100 बेसिस पॉइंट्स का सुधार आया, बेंगलुरु में यील्ड 3.6% से बढ़कर 4.6% और हैदराबाद में 2.6% से बढ़कर 3.6% हुई। कैपिटल वैल्यू की बात करें तो बेंगलुरु में 90% और हैदराबाद में 93% की ग्रोथ दर्ज की गई। मैच्योर मार्केट्स ने भी अपनी ताकत दिखाई, मुंबई में 64% कैपिटल अप्रिसिएशन के साथ रेंटल यील्ड 3.5% से बढ़कर 4.3% हुई, वहीं दिल्ली में सिर्फ 47% कैपिटल ग्रोथ के बावजूद रेंटल यील्ड में 100 बेसिस पॉइंट्स का सुधार आया।
नवी मुंबई में प्रॉपर्टी प्राइसेस 71% और ठाणे में 63% बढ़ीं, दोनों मार्केट्स में रेंटल यील्ड में 80 बेसिस पॉइंट्स का सुधार हुआ। पुणे में कैपिटल वैल्यू 51% की ग्रोथ के साथ रेंटल यील्ड में 65 बेसिस पॉइंट्स का इजाफा हुआ, जबकि चेन्नई में 47% कैपिटल ग्रोथ के साथ 55 बेसिस पॉइंट्स का सुधार आया। कोलकाता में कैपिटल वैल्यू 45% बढ़ी और रेंटल यील्ड में 60 बेसिस पॉइंट्स का सुधार दर्ज किया गया।
कम या ज्यादा रेंटल यील्ड हमें क्या बताती है?
रेंटल यील्ड प्रॉपर्टी की वैल्यू उचित, ज्यादा या कम होने का संकेत देती है। करीब 3% या उससे अधिक यील्ड आमतौर पर उचित वैल्यूएशन मानी जाती है, जबकि 3% से कम यील्ड यह संकेत दे सकती है कि प्रॉपर्टी की वैल्यू किराये की तुलना में ज्यादा है या किराये की डिमांड कमजोर है। मुंबई और बेंगलुरु के कई इलाकों में 3.5-4% या उससे ज्यादा यील्ड देखने को मिल रही है, जो प्रॉपर्टी से बेहतर आय का संकेत है।
निवेशक मौजूदा किराये और स्थानीय रेंटल यील्ड के आधार पर अनुमानित प्रॉपर्टी वैल्यू निकालकर यह जांच सकते हैं कि मांगी गई वैल्यू उचित है या नहीं। इससे अलग-अलग शहरों की तुलना भी अपेक्षित किराये की आय के आधार पर की जा सकती है।
इन्वेस्टर्स के लिए क्या मायने रखता है यह ट्रेंड?
अब वह दौर बदल चुका है जब प्रॉपर्टी को सिर्फ लॉन्ग-टर्म प्राइस अप्रिसिएशन के नजरिए से देखा जाता था। जो शहर कैपिटल ग्रोथ के साथ-साथ रेंटल यील्ड में भी सुधार दिखा रहे हैं, वे इन्वेस्टर्स को बेहतर कैश फ्लो और कुल मिलाकर ज्यादा रिटर्न का मौका देते हैं।
रेंटल यील्ड यह तय करने में मदद करती है कि कोई प्रॉपर्टी इन्वेस्टमेंट के लायक है या नहीं, और क्या उसकी कीमत उसकी असली वैल्यू के अनुरूप है। जो इन्वेस्टर सिर्फ प्राइस ग्रोथ के चक्कर में रेंटल यील्ड को नजरअंदाज करते हैं, वे प्रॉपर्टी की पूरी तस्वीर नहीं देख पाते है।
निष्कर्ष
भारत के प्रमुख शहरों में प्रॉपर्टी मार्केट ने पिछले कुछ वर्षों में मजबूत कैपिटल ग्रोथ के साथ रेंटल इनकम में भी सुधार दिखाया है। हालांकि, हर प्रॉपर्टी एक जैसा रिटर्न नहीं देती। इसलिए सिर्फ कीमत बढ़ने की उम्मीद के बजाय रेंटल यील्ड, लोकेशन, किराये की मांग और प्रॉपर्टी की मौजूदा वैल्यू को भी देखना जरूरी है। खासकर 3% या उससे अधिक की रेंटल यील्ड वाली प्रॉपर्टीज बेहतर कैश फ्लो और उचित वैल्यूएशन का संकेत दे सकती हैं। ऐसे में सही लोकेशन और उचित कीमत पर खरीदी गई प्रॉपर्टी निवेशकों को कैपिटल अप्रिसिएशन के साथ नियमित रेंटल इनकम का दोहरा फायदा दे सकती है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।