एक समय था जब किसी पार्सल के डिलीवर होने में कई दिन लग जाते थे, लेकिन क्विक कॉमर्स के बढ़ने से, ग्रॉसरी जैसी रोज़मर्रा की चीज़ें अब ग्राहकों तक सिर्फ 10 से 15 मिनट में पहुँच जाती हैं। भारत में त्योहारों का सीज़न पहले ही शुरू हो चुका है और ऑनलाइन शॉपिंग प्लेटफॉर्म दिलचस्प ऑफर्स से खरीदारों को आकर्षित कर रहे हैं। डिजिटलीकरण, इंटरनेट की पहुंच और मोबाइल फोन के इस्तेमाल ने इस विकास को और तेज कर दिया है। हालाँकि, अभी भी कुछ चुनौतियाँ हैं जो भारत की लॉजिस्टिक्स सेवाओं की प्रगति को धीमा कर रही हैं।
आज हम भारत के एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री और इसमें मौजूद निवेश के अवसरों के बारे में जानेंगे।
भारतीय एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री की वर्तमान स्थिति
भारत का एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री FY25 में लगभग 9 बिलियन अमेरिकी डॉलर की है और FY17 से हर साल 12 से 15% की स्थिर वृद्धि हुई है। यह अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि इसने FY24 में GST कलेक्शन में लगभग 1 से 1.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर और कस्टम ड्यूटी में लगभग 650 मिलियन अमेरिकी डॉलर का योगदान दिया और शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में लगभग 2.8 से 3 मिलियन लोगों को रोजगार दिया।
डोमेस्टिक एक्सप्रेस मार्केट इंडस्ट्री का लगभग 70% हिस्सा है और इसकी वैल्यू 6.3 से 6.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर है, जिसमें सरफेस एक्सप्रेस मुख्य ड्राइवर है। अंतर्राष्ट्रीय एक्सप्रेस मार्केट बाकी के 30% के लिए जिम्मेदार है और क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स, MSME डिजिटलीकरण और मैन्युफैक्चरिंग निर्यात की वृद्धि के कारण तेजी से विस्तार कर रहा है।
क्विक कॉमर्स, हाइपरलोकल डिलीवरी, और डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर (D2C) ब्रांड्स के उदय ने तेज डिलीवरी की डिमांड को बढ़ा दिया है, जिसके परिणामस्वरूप पहले हावी रहा B2B सेगमेंट अब B2C और C2C सेगमेंट से पीछे हो गया है, जो अब मार्केट का 55% प्रतिनिधित्व करते हैं।
ग्रोथ ड्राइवर्स
बढ़ती डोमेस्टिक आय और खर्च करने की क्षमता: इनकम टैक्स एक्सेम्पशन लिमिट बढ़कर 12 लाख होने के बाद, अधिक घरों की खर्च करने की क्षमता बढ़ी है, जिससे लॉजिस्टिक्स सेवाओं की डिमांड बढ़ रही है।
इंटरनेट और मोबाइल फोन का बढ़ना: सस्ता इंटरनेट और मोबाइल फोन उपयोगकर्ताओं में वृद्धि ने ई-कॉमर्स और डिजिटल लेनदेन को बढ़ावा दिया है, जिससे शिपमेंट की मात्रा अधिक हो गई है।
क्विक कॉमर्स का उदय: दस मिनट की डिलीवरी सेवाओं, ग्रॉसरी और फूड डिलीवरी ऐप्स ने तेज और अधिक विश्वसनीय लॉजिस्टिक्स की आवश्यकता बढ़ा दी है।
बदलती जीवनशैली के तरीके: रेस्तरां में खाने से लेकर घर पर खाना ऑर्डर करने और किराना स्टोर पर जाने से लेकर जेप्टो और इंस्टामार्ट जैसे तुरंत डिलीवरी ऐप्स का उपयोग करने तक, शहरी उपभोक्ता व्यस्त जीवनशैली के कारण सुविधा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
टियर 2 और टियर 3 शहरों का विस्तार: लॉजिस्टिक्स कंपनियां मेट्रो शहरों से परे नए मार्केट्स में प्रवेश कर रही हैं, छोटे शहरों से बढ़ती डिमांड का लाभ उठा रही हैं।
फलता-फूलता ई-कॉमर्स और D2C ब्रांड: ऑनलाइन रिटेल और डायरेक्ट-टू-कंज्यूमर व्यवसाय तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे एक्सप्रेस डिलीवरी नेटवर्क के लिए निरंतर डिमांड पैदा हो रही है।
टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन का उपयोग: AI, IoT, ड्रोन और ऑटोमेटेड वेयरहाउस का उपयोग लॉजिस्टिक्स को तेज, कुशल और लागत-प्रभावी बना रहा है।
चुनौतियाँ
उच्च लॉजिस्टिक्स लागत: ग्लोबल लॉजिस्टिक्स कॉस्ट GDP का औसतन 7 से 8 प्रतिशत है, लेकिन भारत में, यह लगभग 13 से 14 प्रतिशत के करीब बनी हुआ है। सड़क परिवहन पर अत्यधिक निर्भरता, ईंधन का खर्च और फ्रग्मेन्टेड सप्लाई चैन इसके मुख्य कारण हैं।
लास्ट-माइल डिलीवरी की चुनौतियाँ: भारत में, लास्ट-माइल डिलीवरी महंगी है और टियर II और टियर III शहरों में पते संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, साथ ही कैश-ऑन-डिलीवरी पर अत्यधिक निर्भरता है। जबकि विकसित देश अच्छी तरह से संरचित पिन कोड और कुरियर सिस्टम से लाभ उठाते हैं।
कर्मचारियों में कौशल की कमी: भारत में कुशल शॉप फ्लोर वर्कर्स, वेयरहाउस मैनेजर्स और सप्लाई चेन एक्सपर्ट्स की कमी है। प्रशिक्षित कर्मियों की इस कमी से सर्विस की विश्वसनीयता कम हो जाती है और विकसित देशों की तुलना में कार्यों की गति धीमी हो जाती है।
रिटर्न टू ओरिजिन (RTO) में वृद्धि: भारत के तेजी से बढ़ते ई-कॉमर्स क्षेत्र में, बड़ी संख्या में शिपमेंट विक्रेता को वापस भेज दिए जाते हैं जब वे ग्राहक तक नहीं पहुंच पाते हैं। इससे उच्च लागत आती है, सप्लाई चैन बाधित होती हैं और लॉजिस्टिक्स कार्यों को जटिल बना देती हैं।
झूठी शिपिंग प्रथाएं और कुरियर से जुड़ी धोखाधड़ी: स्कैमर असली वेबसाइट जैसी नकली वेबसाइट, झूठे शिपिंग डेटा, या डिलीवरी रिपोर्ट का उपयोग करते हैं, खासकर कैश-ऑन-डिलीवरी ऑर्डर में। ऐसी धोखाधड़ी से RTO बढ़ता है, ऑपरेशनल खर्च बढ़ता है, विवाद होते हैं और पूरे इकोसिस्टम में विश्वास कम होता है।
सस्टनेबिलिटी का दबाव: जबकि कई देशों ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) और कार्बन-न्यूट्रल लॉजिस्टिक्स को अपना लिया है, भारत अभी भी शुरुआती चरण में है। उच्च लागत और खराब इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों के लिए ग्रीन लॉजिस्टिक्स प्रैक्टिस को बढ़ाना मुश्किल बना देता है।
टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन में कमी: विकसित देश AI, रोबोटिक्स, ड्रोन और स्मार्ट वेयरहाउस का व्यापक रूप से उपयोग करते हैं। भारत में, केवल कुछ बड़ी कंपनियां ऑटोमेशन में निवेश करती हैं, जबकि अधिकांश प्लेयर्स पीछे रह जाते हैं। बड़े प्लेयर्स ट्रैकिंग और एनालिटिक्स का उपयोग करते हैं, लेकिन कई छोटी और मध्यम साइज की फर्म अभी भी मैनुअल प्रक्रियाओं पर निर्भर हैं।
जटिल नियम: राज्यों में कई नियम, कस्टम ड्यूटी में देरी और कंप्लायंस अनुपालन की बाधाएं शिपमेंट में रुकावट पैदा करती हैं। इससे लॉजिस्टिक्स कंपनियों की लागत बढ़ जाती है और एफिशिएंसी कम हो जाती है।
भारत के एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री को बढ़ावा देने के लिए सरकार की पहल
मल्टी-मोडल लॉजिस्टिक्स पार्क (MMLPs): सरकार लॉजिस्टिक्स एफिशिएंसी वृद्धि प्रोग्राम के तहत MMLPs स्थापित कर रही है। ये पार्क परिवहन के विभिन्न तरीकों को जोड़ेंगे, माल ढुलाई की लागत कम करेंगे और वेयरहाउसिंग की एफिशिएंसी में सुधार करेंगे। ये कंसाइनमेंट की बेहतर ट्रैकिंग और ट्रेसबिलिटी पर भी ध्यान केंद्रित करते हैं।
राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति (NLP 2022): सितंबर 2022 में लॉन्च की गई इस नीति का लक्ष्य 2030 तक भारत की लॉजिस्टिक्स लागत को 13-14% से घटाकर ग्लोबल औसत 8% करना है। इसका लक्ष्य विश्व बैंक के लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स में भारत की रैंक सुधारना और व्यापार संचालन को आसान बनाना भी है।
भारतमाला प्रोजेक्ट: यह प्रोजेक्ट सड़क कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए आर्थिक कॉरिडोर, फीडर रूट्स और लॉजिस्टिक्स पार्क विकसित करता है। 44 कॉरिडोर को लॉजिस्टिक्स हब्स से जोड़कर, यह हब-एंड-स्पोक मॉडल का पालन करता है ताकि पूरे देश में कार्गो की मूवमेंट तेज और कुशल हो सके।
डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर (DFCs): सरकार माल की ढुलाई को तेज करने के लिए सिर्फ मालगाड़ियों के लिए अलग रेलवे लाइनें बना रही है। पूर्वी कॉरिडोर पूरी तरह से चालू है और पश्चिमी कॉरिडोर का अधिकांश हिस्सा पहले ही काम कर रहा है, जिससे ट्रांजिट टाइम कम होगा और माल ढुलाई की दक्षता बढ़ेगी।
GST, ई-वे बिल, और फास्टैग: इन सुधारों ने सड़क लॉजिस्टिक्स को तेज और अधिक पारदर्शी बना दिया है। ये टैक्स कंप्लायंस को आसान बनाते हैं, चेकपॉइंट्स पर देरी कम करते हैं और पार्सल के ग्राहकों तक समय पर पहुंचने में मदद करते हैं।
वॉचलिस्ट में शामिल करने के लिए स्टॉक्स

भविष्य की संभावनाएं
भारत के एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री को मजबूत विकास के लिए तैयार किया गया है और FY30 तक इसके 18 से 22 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने और लगभग 7 मिलियन नौकरियां पैदा करने का अनुमान है। इसके अलावा, ई-कॉमर्स, हाइपरलोकल डिलीवरी और फास्ट-कॉमर्स मॉडल से प्रेरित होकर, FY30 तक शिपमेंट की मात्रा बढ़कर 29 बिलियन होने की उम्मीद है।
FY24 में अकेले ई-कॉमर्स सेगमेंट ने देश के एक्सप्रेस पार्सल वॉल्यूम का आधे से अधिक योगदान दिया और FY25 तक यह दोगुना होने की संभावना है।
इसके अलावा, ट्रक्स के लिए अनिवार्य एयर-कंडीशंड केबिन जैसे नीतिगत बदलावों से छोटे समय में लागत बढ़ सकती है, लेकिन इससे ड्राइवर्स को आराम, प्रोडक्टिविटी और अंततः बेहतर कनेक्टिविटी में सुधार होगा। इन बदलावों के साथ, भारत का एक्सप्रेस लॉजिस्टिक्स इंडस्ट्री आने वाले दशक में एक ग्लोबल लीडर और विकास का एक प्रमुख ड्राइवर बनने की स्थिति में है।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर