भारत समेत ग्लोबल मार्केट्स में गोल्ड के प्रति निवेशकों के सेंटीमेंट में बदलाव देखने को मिल रहा है। पिछले कुछ वर्षों में गोल्ड ने मजबूत रिटर्न दिया और अनिश्चितताओं के दौर में सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में अपनी पहचान बनाए रखी। लेकिन हाल ही समय में गोल्ड ETF से लगातार निकासी दर्ज की गई है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या निवेशकों का भरोसा गोल्ड से कम हो रहा है या यह केवल मुनाफावसूली का दौर है।
आइए समझते है कि गोल्ड ETF में आउटफ्लो क्यों बढ़ रहा है और इसका निवेशकों पर क्या असर पड़ सकता है।
क्या है मामला?
मई 2026 में ग्लोबल स्तर पर गोल्ड-बैक्ड ETF से लगभग 2 बिलियन डॉलर का आउटफ्लो दर्ज किया गया। इसके परिणामस्वरूप ग्लोबल गोल्ड ETF का एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) 2% m/m घटकर 604 बिलियन डॉलर रह गया, जबकि कुल होल्डिंग्स 0.4% घटकर 4,121 टन पर पहुंच गईं। यह स्तर फरवरी 2026 के रिकॉर्ड हाई 4,176 टन से थोड़ा नीचे है।
भारत में भी मई महीने के दौरान गोल्ड ETF से 61 मिलियन डॉलर यानी लगभग 0.4 मीट्रिक टन का आउटफ्लो दर्ज किया गया। यह पिछले एक वर्ष में पहला ऐसा महीना था जब भारतीय गोल्ड ETF में नेट निकासी देखी गई। इसके बाद कुल होल्डिंग्स 116.3 टन पर आ गईं।
हालांकि तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। YoY आधार पर भारतीय गोल्ड ETF में अब भी 3.48 बिलियन डॉलर का नेट इनफ्लो बना हुआ है। एक्सपर्ट्स के अनुसार डोमेस्टिक गोल्ड पर आयात शुल्क 6% से बढ़ाकर 15% किए जाने के बाद प्राइस में आई तेज बढ़ोतरी के कारण निवेशकों ने मुनाफावसूली को प्राथमिकता दी।
ग्लोबल और क्षेत्रीय रुझान
गोल्ड की प्राइस में तेज उछाल के बाद निवेशकों ने बड़े पैमाने पर मुनाफावसूली की, जिससे गोल्ड ETF में निकासी बढ़ गई। 5 जून को समाप्त सप्ताह में कुल नेट निवेश 17% घटकर 15.28 बिलियन डॉलर रह गया, जो 23 मई को समाप्त सप्ताह में 18.46 बिलियन डॉलर था। इस दौरान 1.05 बिलियन डॉलर का नया निवेश आया, जबकि 2.71 बिलियन डॉलर (करीब 25,845 करोड़ रुपये) की निकासी दर्ज की गई। एक्सपर्ट्स के अनुसार, मजबूत अमेरिकी रोजगार आंकड़ों और ब्याज दरों के लंबे समय तक हाई बने रहने की आशंका से डॉलर मजबूत हुआ, जिसके बाद निवेशकों ने गोल्ड में मुनाफावसूली शुरू कर दी।
सबसे ज्यादा निकासी अमेरिका, कनाडा और चीन के निवेशकों ने की। अमेरिकी निवेशकों ने 1.27 बिलियन डॉलर, चीनी निवेशकों ने 513 मिलियन डॉलर और कनाडा के निवेशकों ने 102 मिलियन डॉलर निकाले। वहीं भारत में मई के दौरान 61 मिलियन डॉलर का आउटफ्लो दर्ज हुआ।
हालांकि, एशिया की तस्वीर पूरी तरह नकारात्मक नहीं है। साल की शुरुआत से अब तक जापान में 1.26 बिलियन डॉलर, हॉन्गकॉन्ग में 930.6 मिलियन डॉलर और दक्षिण कोरिया में 851 मिलियन डॉलर का शुद्ध निवेश आया है। इसके अलावा चीन और भारत अभी भी सालाना आधार पर नेट निवेशक बने हुए हैं, जहां 5 जून तक उनकी गोल्ड ETF होल्डिंग्स क्रमशः 7.29 बिलियन डॉलर और 3.48 बिलियन डॉलर पर थीं।
म्यूचुअल फंड हाउसेस की प्रतिक्रिया
गोल्ड के बढ़ते आयात बिल और विदेशी मुद्रा भंडार पर बढ़ते दबाव को देखते हुए कई बड़े म्यूचुअल फंड हाउसेस ने गोल्ड ETF में बड़े निवेश पर अस्थायी सीमाएं लगा दी हैं। HDFC, ICICI प्रूडेंशियल, टाटा और निप्पॉन इंडिया म्यूचुअल फंड ने 5-8 जून 2026 के बीच ऐसे कदम उठाए। ICICI प्रूडेंशियल म्यूचुअल फंड ने 5 जून के बाद गोल्ड ETF में 25 करोड़ रुपये से अधिक की प्रत्यक्ष सदस्यता स्वीकार न करने का फैसला किया है, हालांकि रिटेल निवेशकों, SIP और रिडेम्प्शन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा।
इस कदम का उद्देश्य गोल्ड ETF में बड़े इनफ्लो के कारण बढ़ने वाली गोल्ड की आयात डिमांड को नियंत्रित करना है। सेबी के नियमों के अनुसार गोल्ड ETF को अपनी कम से कम 95% एसेट फिजिकल गोल्ड में निवेश करनी होती है, इसलिए अत्यधिक निवेश आयात बिल, करंट अकाउंट डेफिसिट और रुपये पर दबाव बढ़ा सकता है। विशेषज्ञ इसे बढ़ती जियोपॉलिटिकल अनिश्चितताओं के बीच वित्तीय स्थिरता बनाए रखने की दिशा में उठाया गया एहतियाती कदम मान रहे हैं।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
गोल्ड ETF से हो रही निकासी को केवल नकारात्मक संकेत के रूप में नहीं देखना चाहिए। पिछले एक वर्ष में गोल्ड ने लगभग 57.1% का मजबूत रिटर्न दिया है। इसलिए हालिया आउटफ्लो का बड़ा हिस्सा मुनाफावसूली से जुड़ा माना जा रहा है। हालांकि पिछले तीन महीनों में गोल्ड में लगभग 3.1% की गिरावट भी दर्ज की गई है, जिससे निकट अवधि में दबाव बना हुआ है।
ऐसे में जिन निवेशकों के पोर्टफोलियो में गोल्ड का हिस्सा जरूरत से ज्यादा बढ़ गया है, वे पोर्टफोलियो रीबैलेंस के लिए आंशिक मुनाफावसूली पर विचार कर सकते हैं। वहीं नए निवेशकों के लिए एकमुश्त निवेश के बजाय SIP या चरणबद्ध निवेश बेहतर रणनीति हो सकती है।
भविष्य की बातें
हालिया निकासी के बावजूद गोल्ड ETF की कुल होल्डिंग्स 4,106.3 टन पर बनी हुई हैं, जो एक साल पहले के 3,559.2 टन के स्तर से काफी अधिक है। यह दर्शाता है कि शॉर्टटर्म मुनाफावसूली के बावजूद लंबी अवधि के निवेशकों का भरोसा गोल्ड पर कायम है। आगे चलकर गोल्ड की दिशा ग्लोबल ब्याज दरों, महंगाई, डॉलर की मजबूती और जियोपॉलिटिकल घटनाक्रमों पर निर्भर करेगी। यदि अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत रहती है और ब्याज दरें लंबे समय तक हाई बनी रहती हैं, तो गोल्ड पर दबाव बना रह सकता है।
बिज़नेस स्टैंडर्ड के अनुसार एक्सपर्ट्स का मानना है कि मौजूदा स्तर पर निवेशकों को गोल्ड में आक्रामक निवेश से बचना चाहिए और कुल पोर्टफोलियो में गोल्ड का हिस्सा 5-10% तक रखना और कम से कम 7 साल का निवेश नजरिया अपनाना अधिक संतुलित रणनीति मानी जा सकती है।
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