भारतीय कंपनियों की फंडिंग रणनीति में तेजी से बदलाव दिखाई दे रहा है। कारोबार के विस्तार, वर्किंग कैपिटल, पुराने कर्ज की रीफाइनेंसिंग और अस्थायी कैश-फ्लो जरूरतों को पूरा करने के लिए कंपनियां अब केवल बैंक लोन पर निर्भर नहीं रहना चाहतीं। इसी कारण कमर्शियल पेपर यानी CP एक महत्वपूर्ण शॉर्ट-टर्म फंडिंग माध्यम बनकर उभरा है।
वित्त वर्ष 2026-27 की अप्रैल-जून तिमाही में कंपनियों ने कमर्शियल पेपर्स के माध्यम से ₹5.37 लाख करोड़ जुटाए, जो पिछले 18 क्वार्टर्स का सबसे हाई स्तर है। जून में अकेले ₹2.53 लाख करोड़ से ₹2.55 लाख करोड़ के बीच इश्यूएंस दर्ज हुआ, जो लगभग पांच वर्षों या 55 महीनों का उच्चतम स्तर रहा।
आइए कमर्शियल पेपर को विस्तारपूर्वक समझें और जानें कि कंपनियों तथा निवेशकों के लिए इसका बढ़ता उपयोग क्या संकेत देता है।
क्या है मामला?
कमर्शियल पेपर एक शॉर्ट-टर्म डेट इंस्ट्रूमेंट है, जिसके माध्यम से कोई कंपनी सीधे निवेशकों से पैसा उधार लेती है। इसे कंपनी द्वारा जारी किया गया एक प्रकार का लिखित भुगतान वादा माना जा सकता है। इसका उपयोग सप्लायर्स को भुगतान करने, रॉ मटेरियल खरीदने, वर्किंग कैपिटल संभालने या अस्थायी कैश-फ्लो गैप को पूरा करने के लिए किया जाता है।
RBI के नियमों के अनुसार कमर्शियल पेपर की मैच्योरिटी सात दिनों से लेकर एक वर्ष तक हो सकती है। यह अनसिक्योर्ड इंस्ट्रूमेंट होता है, यानी इसके बदले प्रॉपर्टी, मशीनरी या दूसरी एसेट्स को कोलेटरल के रूप में नहीं रखा जाता। इसलिए निवेशक पूरी तरह जारीकर्ता की वित्तीय क्षमता और क्रेडिट प्रोफाइल पर निर्भर रहते हैं।
कंपनियां, प्राइमरी डीलर्स और RBI की पात्रता शर्तें पूरी करने वाले कुछ ऑल इंडिया फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस इन्हें जारी कर सकते हैं। जारीकर्ता को RBI से मान्यता प्राप्त एजेंसी से क्रेडिट रेटिंग लेनी होती है। न्यूनतम रेटिंग क्रिसिल की P-2 या उसके बराबर होनी चाहिए और इश्यू के समय यह रेटिंग वैध रहनी चाहिए।
कमर्शियल पेपर से कंपनियों को कैसे मिलता है फंड?
कमर्शियल पेपर्स सामान्यतः फेस वैल्यू से कम प्राइस यानी डिस्काउंट पर जारी किए जाते हैं। उदाहरण के लिए, ₹100 फेस वैल्यू वाला पेपर निवेशक ₹97 में खरीद सकता है। मैच्योरिटी पर कंपनी ₹100 का भुगतान करती है और ₹3 का अंतर निवेशक का रिटर्न बनता है। इसकी बॉरोइंग कॉस्ट जारीकर्ता की क्रेडिट रेटिंग, मार्केट लिक्विडिटी और प्रचलित इंटरेस्ट रेट्स पर निर्भर करती है।
यदि किसी NBFC को छह महीने के लिए व्हीकल लोन फाइनेंस करने हेतु ₹1,000 करोड़ चाहिए, तो वह बैंक लोन लेने के बजाय उतनी राशि के CP जारी कर सकती है। म्यूचुअल फंड्स, बैंक, इंश्योरेंस कंपनियां या अन्य इंस्टीट्यूशनल इन्वेस्टर्स इसे खरीद सकते हैं। मैच्योरिटी पर रकम लौटाने के बाद जरूरत बनी रहने पर कंपनी नया CP जारी कर सकती है।
हिमाद्री स्पेशलिटी केमिकल (Himadri Speciality Chemical) ने इसी व्यवस्था के तहत ₹150 करोड़ जुटाए। कंपनी ने ₹5 लाख फेस वैल्यू वाली 3,000 यूनिट्स जारी कीं, जिन्हें कोटक महिंद्रा बैंक ने खरीदा। 90 दिनों के इस अनसिक्योर्ड इश्यू का फिक्स्ड कूपन 6.60% सालाना है। अलॉटमेंट 9 जुलाई 2026 को हुआ और मैच्योरिटी 7 अक्टूबर 2026 तय की गई। ICICI बैंक ने इश्यू एंड पेइंग एजेंट की भूमिका निभाई।
इश्यूएंस में इतनी तेज वृद्धि क्यों हुई?
प्राइम डेटाबेस के अनुसार, जून में CP के माध्यम से जुटाई गई राशि मई के ₹1.37 लाख करोड़ से 84.6% अधिक रही। जून 2025 के ₹1.59 लाख करोड़ की तुलना में यह 59.4% बढ़ी। इससे पहले जुलाई 2021 में कंपनियों ने ₹2.69 लाख करोड़ जुटाए थे।
RBI के अनुसार, अप्रैल 2026 में ₹1.45 लाख करोड़ और मई में करीब ₹1.38 लाख करोड़ के CP जारी हुए। जून के पहले पखवाड़े में इश्यूएंस ₹1.59 लाख करोड़ और दूसरे पखवाड़े में ₹96,000 करोड़ से अधिक रहा। जून में NBFCs ने ₹1.04 लाख करोड़, कॉरपोरेट्स ने ₹80,000 करोड़ और पब्लिक फाइनेंशियल एंटिटीज ने ₹70,000 करोड़ के CP जारी किए।
इसी तिमाही में इन्क्रीमेंटल बैंक क्रेडिट भी 133% बढ़कर ₹5.6 लाख करोड़ हो गया, जबकि पिछले वर्ष यह ₹2.4 लाख करोड़ था। इससे संकेत मिलता है कि CP ने बैंक लोन की जगह नहीं ली, बल्कि कंपनियों ने दोनों माध्यमों का उपयोग किया। RBI ने विभिन्न वेरिएबल रेट रेपो ऑक्शंस से बैंकिंग सिस्टम में ₹6 लाख करोड़ से अधिक की अस्थायी लिक्विडिटी डाली, जबकि 5 जुलाई को सिस्टम में लगभग ₹1.85 लाख करोड़ का सरप्लस था।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
कमर्शियल पेपर्स मुख्य रूप से म्यूचुअल फंड्स, बैंक, इंश्योरेंस कंपनियों, पेंशन फंड्स, कॉरपोरेट ट्रेजरीज और योग्य फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स द्वारा खरीदे जाते हैं। रिटेल निवेशक भी निवेश कर सकते हैं, लेकिन ₹5 लाख या उसके मल्टीपल्स की डिनॉमिनेशन के कारण उनकी भागीदारी सीमित रहती है।
निवेशकों को कम अवधि में पहले से तय रिटर्न मिल सकता है, लेकिन CP अनसिक्योर्ड होता है। इसलिए केवल आकर्षक यील्ड देखना पर्याप्त नहीं है। जारीकर्ता की क्रेडिट रेटिंग, भुगतान क्षमता, मैच्योरिटी और फंड के उपयोग को समझना जरूरी है। हिमाद्री के उदाहरण में निश्चित 6.60% कूपन और 90 दिनों की मैच्योरिटी कैश फ्लो की स्पष्टता देते हैं, लेकिन सुरक्षा अंततः कंपनी की वित्तीय मजबूती पर निर्भर करती है।
भविष्य की बातें
जुलाई से सितंबर 2026 के बीच लगभग ₹4 लाख करोड़ के CP मैच्योर होने हैं। इनमें करीब ₹70,000 करोड़ जुलाई, ₹1.07 लाख करोड़ अगस्त और ₹2.31 लाख करोड़ सितंबर में मैच्योर होंगे। NBFCs की हिस्सेदारी इन मैच्योरिटीज में 41% है, जबकि शीर्ष 10 जारीकर्ताओं का हिस्सा 47% है।
आने वाले महीनों में रीफाइनेंसिंग का दबाव कुछ कम हो सकता है, लेकिन NBFC बैलेंस शीट्स का विस्तार, कॉरपोरेट वर्किंग कैपिटल की जरूरत और मजबूत निवेशक डिमांड CP इश्यूएंस को ऊंचा रख सकती है। हालांकि मार्केट की अधिक निर्भरता कुछ बड़े जारीकर्ताओं पर होने के कारण क्रेडिट क्वालिटी और लिक्विडिटी की निगरानी महत्वपूर्ण रहेगी। कमर्शियल पेपर मार्केट की बढ़ती गतिविधि फिलहाल यह दिखाती है कि कंपनियां अपनी फंडिंग कॉस्ट को बेहतर बनाने और बैंक तथा मार्केट बॉरोइंग के बीच संतुलन बनाने पर अधिक ध्यान दे रही हैं।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।