2025 के अंत और 2026 की शुरुआत में कॉपर ने कमोडिटी मार्केट में जबरदस्त हलचल मचा दी है। लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर की प्राइस रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुकी हैं, जबकि अमेरिका और एशिया के मार्केट्स में भी रेड मेटल को लेकर मजबूत तेजी देखी जा रही है। गोल्ड और सिल्वर के साथ-साथ अब कॉपर और एल्यूमिनियम जैसी इंडस्ट्रियल मेटल्स भी निवेशकों के रडार पर आ गई हैं।
2025 का साल कॉपर के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष साबित हुआ है, जहाँ प्राइस ने पिछले कई दशकों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया है। एनालिस्ट इसे 2009 के बाद की सबसे बड़ी सालाना तेजी मान रहे हैं। आइए समझते है कि कैसे यह स्थिति न केवल कमोडिटी ट्रेडर्स के लिए बल्कि आम निवेशकों और उपभोक्ताओं के लिए भी मायने रखती है।
क्या है मामला?
हालिया आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगता है। लंदन मेटल एक्सचेंज (LME) पर कॉपर की प्राइस 12,000 डॉलर प्रति टन के स्तर को पार कर गई हैं, जो एक नया ऑल टाइम हाई स्तर है। जबकि भारतीय फ्यूचर्स ₹1,240 प्रति किलो के ऊपर पहुंच गए। 2025 में अब तक कॉपर में 35% से अधिक की तेजी दर्ज की गई है, जो 2009 के बाद से किसी भी एक साल में देखी गई सबसे बड़ी उछाल है।
कुल मिलाकर, LME का तीन महीने का कॉन्ट्रैक्ट 2025 में करीब 41% की बढ़त दर्ज कर चुका है और 2009 के बाद अपने सबसे मजबूत साल की ओर बढ़ रहा है, जब ग्लोबल वित्तीय संकट के बाद प्राइस में 140% से ज्यादा उछाल आया था। वहीं न्यूयॉर्क मार्केट में भी कॉपर 2025 की शुरुआत से 40% से अधिक चढ़ चुका है।
AI और डेटा सेंटर की भारी डिमांड
इस ऐतिहासिक तेजी के पीछे सबसे बड़ा स्ट्रक्चरल कारण आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डेटा सेंटर्स का विस्तार है। हम जिस डिजिटल क्रांति के दौर में हैं, वह कॉपर के बिना अधूरी है। AI को चलाने वाले डेटा सेंटर्स सामान्य डेटा सेंटर्स की तुलना में कहीं अधिक बिजली और कूलिंग सिस्टम की डिमांड करते हैं, और इसमें कॉपर की भूमिका अनिवार्य है।
आंकड़े बताते हैं कि एक पारंपरिक डेटा सेंटर में लगभग 5,000 से 15,000 टन कॉपर का उपयोग होता है। इसके विपरीत, AI को सपोर्ट करने वाले ‘हाइपरस्केल’ डेटा सेंटर की डिमांड एकदम अलग स्तर पर है। एक हाइपरस्केल डेटा सेंटर को संचालित करने के लिए 50,000 टन तक कॉपर की आवश्यकता हो सकती है। यह भारी भरकम अंतर स्पष्ट करता है कि क्यों मार्केट में अचानक इस धातु की कमी महसूस की जा रही है। इसके अलावा, इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) और रिन्यूएबल एनर्जी की तरफ दुनिया का बढ़ता झुकाव भी इस डिमांड को और बढ़ा रहा है, क्योंकि ये क्षेत्र पारंपरिक इंजनों की तुलना में कई गुना अधिक कॉपर की कंजम्पशन करते हैं।
सप्लाई में रुकावट और टैरिफ का असर
जहाँ एक ओर डिमांड आसमान छू रही है, वहीं दूसरी ओर सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हुई है। 2025 में दुनिया की प्रमुख खदानों में कई दुर्घटनाएं और ऑपरेशनल संबंधी बाधाएं देखने को मिलीं। इंडोनेशिया में स्थित ग्रासबर्ग (Grasberg) खदान में ऑपरेशन ठप होने और चिली की एल टेनिएंटे (El Teniente) खदान में सुरंग ढहने जैसी घटनाओं ने रॉ मटेरियल की सप्लाई को बाधित कर दिया है।
इसके साथ ही, US व्यापार नीतियों ने भी मार्केट में आग में घी डालने का काम किया है। US राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा सेमी-फिनिश्ड कॉपर आयात पर 50% टैरिफ लगाने की घोषणा ने US खरीदारों में घबराहट पैदा कर दी। संभावित उच्च लागत से बचने के लिए, US कंपनियों ने टैरिफ लागू होने से पहले ही आक्रामक रूप से कॉपर का रिज़र्व (Stockpiling) शुरू कर दिया। इस वजह से COMEX और LME की प्राइस में अंतर (arbitrage) पैदा हो गया और ग्लोबल मार्केट में सप्लाई और भी तंग हो गई।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
कॉपर की इस ऐतिहासिक रैली का सीधा असर शेयर मार्केट और निवेशकों के पोर्टफोलियो पर दिखाई दे रहा है। मेटल इंडेक्स ने लगातार बढ़त बनाते हुए ऑल टाइम हाई को पार करते हुए 11,400 से ऊपर ट्रेड कर रहा है। विशेष रूप से कॉपर उत्पादक कंपनियों के शेयर्स में जबरदस्त उछाल देखा गया है। हिंदुस्तान कॉपर का शेयर अपने ऑल टाइम हाई के पास पहुंच गया। इसी तरह, नाल्को और अन्य मेटल शेयर्स में भी तेजी देखने को मिली है।
निवेशकों के लिए यह केवल कॉपर तक सीमित नहीं है। व्यापक कमोडिटी मार्केट में भी तेजी का रुख है। यह स्पष्ट संकेत है कि इंडस्ट्रियल मेटल्स और कीमती मेटल्स एक ‘मॉन्स्टर रैली’ की ओर बढ़ रही हैं, जो निवेशकों के लिए अर्निंग्स के नए अवसर खोल रही हैं, लेकिन साथ ही हाई वैल्यूएशन का जोखिम भी ला रही हैं।
भविष्य की बातें
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक, इंडस्ट्रियल मेटल्स की प्राइस में आई मजबूती के पीछे सप्लाई में रुकावटें, पॉलिसी से जुड़े बदलाव और ग्लोबल स्तर पर लगातार निवेश जैसे अहम कारण हैं। इसी आधार पर ब्रोकरेज ने यह संकेत दिया है कि 2026 की पहली छमाही तक कॉपर की औसत प्राइस हाई स्तर पर बनी रह सकती हैं। यह रुझान दिखाता है कि मौजूदा तेजी केवल शॉर्ट-टर्म नहीं, बल्कि स्ट्रक्चरल फैक्टर्स से जुड़ी हुई है।
द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, जैसे-जैसे यह रैली मेटल्स से निकलकर इंडस्ट्रियल कमोडिटीज तक फैल रही है, इसका असर आम उपभोक्ताओं पर भी महसूस होना तय माना जा रहा है। रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कई प्रोडक्ट्स महंगे हो सकते हैं, क्योंकि मेटल की हाई प्राइस अब लागत का स्थायी हिस्सा बनती जा रही हैं। हालांकि, कुल मिलाकर आउटलुक सकारात्मक बना हुआ है, लेकिन 2026 में प्राइस में उतार-चढ़ाव देखने की संभावना जताई गई है। टैरिफ पॉलिसी, माइंस की रिकवरी, चीन की डिमांड में बदलाव या डॉलर के मजबूत होने जैसे फैक्टर्स इस तेजी की दिशा को प्रभावित कर सकते हैं।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर