भारत वर्तमान में अपनी निर्यात क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा है, जहां इंजीनियरिंग सेक्टर आर्थिक विकास का सबसे बड़ा इंजन बनकर उभर रहा है। पिछले एक दशक में इस सेक्टर ने उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है और अब यह देश के कुल मर्चेंडाइज निर्यात का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुका है। ग्लोबल आर्थिक अनिश्चितताओं, सप्लाई चेन चुनौतियों और जियोपॉलिटिकल तनावों के बावजूद भारतीय इंजीनियरिंग इंडस्ट्री ने जिस मजबूती का प्रदर्शन किया है, वह देश की बढ़ती मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और ग्लोबल प्रतिस्पर्धात्मकता को दर्शाता है।
आइए भारत के इंजीनियरिंग निर्यात बूम को विस्तारपूर्वक समझें और जानें क्या यह निवेशकों के लिए एक बड़ा अवसर बन सकता है।
क्या है मामला?
भारत का इंजीनियरिंग निर्यात FY25-26 में रिकॉर्ड 122.43 बिलियन US डॉलर तक पहुंच गया है। यह FY14-15 के लगभग 70 बिलियन US डॉलर के स्तर से करीब 75% की वृद्धि को दर्शाता है। इसके साथ ही इंजीनियरिंग सेक्टर अब देश के कुल मर्चेंडाइज निर्यात में लगभग 28% योगदान दे रहा है, जिससे यह भारत का सबसे बड़ा निर्यात सेगमेंट बन गया है।
वाणिज्य विभाग के जॉइंट सेक्रेटरी विमल आनंद के अनुसार, पिछले 12 वर्षों में हासिल की गई यह उपलब्धि भारतीय मैन्युफैक्चरिंग इकोसिस्टम की बढ़ती मजबूती, प्रतिस्पर्धात्मकता और फ्लेक्सिबिलिटी का प्रमाण है। भारतीय इंजीनियरिंग प्रोडक्ट अब केवल पारंपरिक मार्केट्स तक सीमित नहीं हैं, बल्कि नॉर्थ अमेरिका, यूरोपियन यूनियन और अन्य विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी मजबूत उपस्थिति बना चुके हैं।
रिकॉर्ड प्रदर्शन के पीछे क्या रहे प्रमुख कारण?
इंजीनियरिंग निर्यात में आई इस तेजी के पीछे सरकार और इंडस्ट्री दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सरकार ने निर्यातकों और इंडस्ट्री संगठनों के साथ लगातार संवाद बनाए रखते हुए उनकी चुनौतियों का समाधान करने का प्रयास किया।
मार्केट एक्सेस इनिशिएटिव (MAI) स्कीम, ब्रांड इंडिया इंजीनियरिंग कैंपेन, प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) स्कीम, नेशनल सिंगल विंडो सिस्टम, क्वालिटी कंट्रोल ऑर्डर्स और वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट (ODOP) जैसी पहलों ने निर्यात क्षमता को मजबूत करने में अहम योगदान दिया है।
इन प्रयासों का असर निर्यात आंकड़ों में भी साफ दिखाई देता है। इंजीनियरिंग निर्यात लगातार तीन वर्षों से रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है। FY23-24 में यह 109.3 बिलियन डॉलर, FY24-25 में 116.67 बिलियन डॉलर और FY25-26 में बढ़कर 122.43 बिलियन डॉलर हो गया।
EEPC इंडिया के चेयरमैन पंकज चड्ढा का मानना है कि मजबूत डोमेस्टिक अर्थव्यवस्था, और सरकार द्वारा किए गए लक्षित हस्तक्षेपों ने इस सेक्टर को लगातार आगे बढ़ने में मदद की है।
चुनौतियों के बीच भी मजबूत बनी रही निर्यात क्षमता
इंजीनियरिंग निर्यात की यह उपलब्धि ऐसे समय में हासिल हुई है जब ग्लोबल अर्थव्यवस्था कई चुनौतियों का सामना कर रही थी। जियोपॉलिटिकल तनाव, सप्लाई चेन व्यवधान, विकसित देशों में धीमी आर्थिक वृद्धि, कड़ी वित्तीय परिस्थितियां और करेंसी एक्सचेंज रेट्स में उतार-चढ़ाव जैसे फैक्टर्स ग्लोबल व्यापार पर दबाव बना रहे थे।
इसके बावजूद भारतीय निर्यातकों ने परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढालने की क्षमता दिखाई। पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और लॉजिस्टिक्स व्यवधानों के दौरान सरकार और इंडस्ट्री के बीच बेहतर समन्वय ने निर्यात गतिविधियों को प्रभावित होने से काफी हद तक बचाया।
सरकार द्वारा शुरू की गई RELIEF स्कीम ने बढ़ती लॉजिस्टिक्स और इंश्योरेंस लागत के प्रभाव को कम करने में सहायता की। सेक्टरीय स्तर पर देखें तो FY26 में पश्चिमी भारत ने सबसे बड़ा योगदान दिया और कुल इंजीनियरिंग निर्यात का लगभग 39% हिस्सा, यानी 47.5 बिलियन डॉलर का निर्यात इसी सेक्टर से हुआ।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
इंजीनियरिंग निर्यात की मजबूत वृद्धि केवल व्यापारिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा प्रभाव देश की आर्थिक गतिविधियों, रोजगार सृजन और इंडस्ट्रियल निवेश पर पड़ता है।
सरकार ने हाल ही में एक्सपोर्ट प्रमोशन मिशन के लिए 25,060 करोड़ रुपये का आवंटन किया है, जिसका उद्देश्य भारतीय निर्यातकों को ग्लोबल मार्केट्स में अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। इसके अलावा UK, EU, UAE, ऑस्ट्रेलिया और EFTA देशों के साथ हुए या प्रस्तावित फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स (FTA) भारतीय कंपनियों के लिए नए अवसर पैदा कर सकते हैं।
PLI जैसी योजनाएं डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को बढ़ाने में मदद कर रही हैं, जिससे इंजीनियरिंग कंपनियों के लिए प्रोडक्टन बढ़ाना और ग्लोबल डिमांड को पूरा करना आसान हो रहा है।
भविष्य की बातें
आने वाले वर्षों में भारत का फोकस निर्यात-आधारित डेवलपमेंट मॉडल को और मजबूत करने पर रहेगा। सरकार मार्केट पहुंच बढ़ाने, ट्रेड बैरियर्स कम करने और भारतीय कंपनियों को ग्लोबल वैल्यू चेन्स में अधिक गहराई से शामिल करने के लिए लगातार काम कर रही है।
UK, EU, UAE, ऑस्ट्रेलिया और EFTA देशों के साथ हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट्स भारतीय इंजीनियरिंग प्रोडक्ट्स की प्रतिस्पर्धात्मकता को और बढ़ा सकते हैं। साथ ही, मैन्युफैक्चरिंग और लॉजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार से भारतीय निर्यातकों की लागत दक्षता बेहतर होने की संभावना है।
हालांकि ग्लोबल आर्थिक मंदी, जियोपॉलिटिकल तनाव और सप्लाई चेन संबंधी जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन मजबूत नीतिगत समर्थन, डाइवर्सिफाइड निर्यात मार्केट और भारतीय इंडस्ट्री की अनुकूलन क्षमता इस सेक्टर के लिए सकारात्मक संकेत दे रही है।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।