भारत सरकार विदेशी निवेशकों के लिए सॉवरेन डेट मार्केट को अधिक आकर्षक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कानूनी कदम उठा रही है।
ऑर्डिनेंस के माध्यम से विदेशी निवेशकों को सरकारी सिक्योरिटीज से मिलने वाले इंटरेस्ट इनकम और उनके ट्रांसफर से होने वाले कैपिटल गेन्स पर इनकम टैक्स से छूट दी गई थी। इसका उद्देश्य भारत में स्थिर विदेशी पूंजी आकर्षित करना, सरकारी बॉन्ड मार्केट में लिक्विडिटी बढ़ाना और रुपये पर बने दबाव को कम करना था।
आइए इस प्रस्तावित इनकम टैक्स अमेंडमेंट बिल को विस्तारपूर्वक समझें और जानें कि यह विदेशी निवेशकों, भारतीय डेट मार्केट और रुपये के लिए कितना महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या है मामला?
इनकम टैक्स (अमेंडमेंट) बिल, 2026, को 20 जुलाई से शुरू हुए संसद के मानसून सत्र में पेश किया गया है। यह बिल पिछले महीने जारी किए गए इनकम टैक्स (अमेंडमेंट) ऑर्डिनेंस, 2026, का स्थान लेगा। ऑर्डिनेंस किसी तत्काल आवश्यकता को देखते हुए लागू किया गया था, लेकिन इसे स्थायी कानून बनाने के लिए संसद की मंजूरी जरूरी है।
5 जून की गजट नोटिफिकेशन के अनुसार, टैक्स छूट 1 अप्रैल 2026 से प्रभावी की गई थी। इसके तहत विदेशी निवेशकों को सरकारी सिक्योरिटीज की बिक्री, एक्सचेंज या ट्रांसफर से होने वाले कैपिटल गेन्स के साथ-साथ उनसे मिलने वाले इंटरेस्ट इनकम पर भी छूट प्रदान की गई।
यह फैसला ऐसे समय लिया गया, जब पश्चिम एशिया संकट के कारण ग्लोबल मार्केट में अनिश्चितता बढ़ी, क्रूड ऑयल की प्राइस में तेज वृद्धि हुई और ग्लोबल सप्लाई चेन्स में बाधाएं सामने आईं। इन परिस्थितियों से रुपये पर दबाव बढ़ा, जिसके बाद सरकार ने विदेशी पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहित करने का निर्णय लिया।
विदेशी निवेशकों को टैक्स में क्या राहत मिली?
इस बदलाव से पहले विदेशी निवेशकों को लिस्टेड शेयर्स और बॉन्ड्स को 12 महीने से अधिक समय तक रखने के बाद होने वाले लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स पर 12.5% टैक्स देना पड़ता था। इसके अलावा सरकारी बॉन्ड्स से मिलने वाले इंटरेस्ट पर 20% विदहोल्डिंग टैक्स लागू होता था।
नए प्रावधानों के तहत योग्य सरकारी सिक्योरिटीज से मिलने वाले इंटरेस्ट और उनकी बिक्री, एक्सचेंज या ट्रांसफर से उत्पन्न कैपिटल गेन्स को इनकम टैक्स से मुक्त किया गया है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय गवर्नमेंट सिक्योरिटीज से मिलने वाला पोस्ट-टैक्स रिटर्न बेहतर हो सकता है।
टैक्स लागत कम होने से भारत के सॉवरेन डेट इंस्ट्रूमेंट्स दूसरे मार्केट्स की तुलना में अधिक प्रतिस्पर्धी बन सकते हैं। हालांकि अंतिम कानूनी स्थिति प्रस्तावित बिल के संसद से पारित होने, राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने और संबंधित नियमों के नोटिफिकेशन के बाद स्पष्ट होगी।
सॉवरेन डेट मार्केट और रुपये के लिए महत्व
प्रस्तावित बिल का मुख्य उद्देश्य भारत के सॉवरेन डेट मार्केट को गहरा बनाना, स्थिर ग्लोबल कैपिटल इनफ्लो आकर्षित करना और सरकारी सिक्योरिटीज में लिक्विडिटी बढ़ाना है। जब अधिक विदेशी निवेशक सरकारी बॉन्ड्स खरीदते हैं, तो मार्केट में खरीदारों की संख्या बढ़ सकती है और बड़े लेनदेन करना आसान हो सकता है।
सरकार ने यह कदम रुपये पर बने दबाव को कम करने के उद्देश्य से भी उठाया था। विदेशी निवेश के साथ देश में फॉरेन करेंसी का फ्लो बढ़ सकता है। हालांकि इसका वास्तविक असर ग्लोबल इंटरेस्ट रेट्स, क्रूड ऑयल की प्राइस, जियोपॉलिटिकल अनिश्चितता और निवेशकों के रिस्क एप्रोच पर निर्भर करेगा।
सरकार ने मानसून सत्र के लिए पांच नए बिल लिस्टेड किए हैं। इनके अलावा फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेगुलेशन अमेंडमेंट और MSME से संबंधित सुधार भी प्रस्तावित विधायी एजेंडे का हिस्सा हैं। इससे संकेत मिलता है कि सत्र में टैक्स, विदेशी पूंजी और बिजनेस रेगुलेशन पर विशेष ध्यान रहेगा।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
विदेशी निवेशकों के लिए सबसे बड़ा संभावित लाभ भारतीय सरकारी सिक्योरिटीज पर कम टैक्स लागत है। इंटरेस्ट इनकम पर पहले लागू 20% विदहोल्डिंग टैक्स और योग्य कैपिटल गेन्स पर टैक्स छूट मिलने से उनका नेट रिटर्न बढ़ सकता है। इससे लॉन्ग टर्म ग्लोबल फंड्स भारतीय गवर्नमेंट बॉन्ड्स में अपना एक्सपोजर बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं।
भारतीय निवेशकों के लिए इसका प्रभाव अप्रत्यक्ष होगा। विदेशी भागीदारी बढ़ने से बॉन्ड मार्केट की लिक्विडिटी और प्राइस डिस्कवरी बेहतर हो सकती है। स्थिर विदेशी पूंजी रुपये को समर्थन देती है तो इससे विदेशी मुद्रा से जुड़ी अस्थिरता में कमी आ सकती है।
फिर भी, निवेशकों को यह समझना होगा कि बिल अभी प्रस्तावित है। संसद में इसके प्रावधानों पर चर्चा या बदलाव संभव हैं। इसलिए केवल टैक्स छूट के आधार पर निर्णय लेने के बजाय अंतिम कानून और उसके लागू होने की शर्तों को देखना आवश्यक होगा।
भविष्य की बातें
आने वाले समय में सरकार अध्यादेश की जगह संसद में विधेयक पेश करेगी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा हस्ताक्षरित इस अध्यादेश में बैंक फॉर इंटरनेशनल सेटलमेंट्स यानी BIS को वर्ष 1930 में स्थापित और स्विट्जरलैंड के बेसल में स्थित अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था के रूप में परिभाषित किया गया है। इसमें भारतीय कानून के तहत विदेशी संस्थागत निवेशकों और सरकारी प्रतिभूतियों की मौजूदा परिभाषाओं को भी शामिल किया गया है। संसद का सत्र नहीं चलने और तत्काल कार्रवाई की जरूरत के कारण संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत यह अध्यादेश जारी किया गया था।
इसके अलावा, सरकार वर्ष 2022-23 के लिए अतिरिक्त अनुदान मांगें भी पेश करेगी। संसद में माइक्रो, स्मॉल एंड मीडियम एंटरप्राइजेज डेवलपमेंट (अमेंडमेंट) बिल, 2026 भी लाया जाएगा। इसका उद्देश्य MSME कानून को मौजूदा कारोबारी परिस्थितियों के अनुरूप बनाना, ईज ऑफ डूइंग बिजनेस को बढ़ावा देना और भरोसा आधारित नियम लागू करना है। यह बिल छोटे उद्यमों के लंबित भुगतान विवादों के समाधान, आर्बिट्रल अवॉर्ड के प्रभावी पालन और राज्यों को MSE फैसिलिटेशन काउंसिल की संरचना तय करने में अधिक फ्लेक्सिबिलिटी देने पर भी केंद्रित होगा।
डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।
सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।