भारत ने इस साल अपना दूसरा फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) साइन किया है। यूनाइटेड किंगडम के साथ समझौते के सिर्फ छह महीने बाद भारत ने ओमान के साथ कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) को अंतिम रूप दिया है। मस्कट में साइन हुआ यह ट्रेड एग्रीमेंट, इन्वेस्टमेंट और सर्विसेज में सहयोग बढ़ाने का लक्ष्य रखता है और दोनों देशों के बीच लगातार मजबूत होते आर्थिक संबंधों को दिखाता है।
ऐसे समय में जब निवेशक भारत-US ट्रेड एग्रीमेंट की संभावनाओं पर नजर बनाए हुए हैं, कैलेंडर ईयर खत्म होने से पहले साइन हुआ यह नया FTA एक संतुलित रूप से पॉजिटिव संकेत देता है। यह ग्लोबल ट्रेड पार्टनरशिप बढ़ाने और डोमेस्टिक बिज़नेस के लिए मार्केट एक्सेस सुधारने को लेकर भारत के प्रोएक्टिव एप्रोच को दर्शाता है।
आइए इस FTA को विस्तार से समझते हैं और देखते हैं कि यह भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रमुख सेक्टर्स और आपके इन्वेस्टमेंट पोर्टफोलियो को कैसे प्रभावित कर सकता है।
क्या है मामला?
भारत और ओमान ने कॉम्प्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (CEPA) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह समझौता ऐसे समय में हुआ है जब निर्यात को ग्लोबल चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और यह पर्शियन गल्फ में भारत की आर्थिक और रणनीतिक मौजूदगी को मजबूत करता है।
CEPA के तहत भारत के करीब 98% निर्यात को ओमान में ड्यूटी-फ्री एक्सेस मिलेगा, जबकि भारत ओमान से आने वाले लगभग 77% आयात पर टैरिफ घटाएगा। एग्रीकल्चर प्रोडक्ट्स, डेयरी, गोल्ड और ऑयल एंड गैस जैसे संवेदनशील प्रोडक्ट्स को इस डील से बाहर रखा गया है। ओमान के कुछ प्रोडक्ट्स जैसे डेट्स, मार्बल और चुनिंदा पेट्रोकेमिकल्स भारत में जीरो ड्यूटी पर आएंगे, लेकिन तय मात्रा की सीमा के भीतर।
फिलहाल, ओमान में कई भारतीय प्रोडक्ट्स पर 5 से 6% इम्पोर्ट ड्यूटी लगती है, जबकि कुछ फूड आइटम्स पर 100% तक टैरिफ है। उम्मीद है कि यह ड्यूटी FY 2026 की पहली तिमाही में समझौता लागू होने के बाद हटा दी जाएगी।
भारत-ओमान ट्रेड: प्रमुख आयात और निर्यात
ओमान गल्फ रीजन में भारत का एक अहम ट्रेड पार्टनर है, लेकिन फिलहाल ट्रेड बैलेंस ओमान के पक्ष में है। 2024 में दोनों देशों के बीच कुल मर्चेंडाइज़ ट्रेड $10.6 बिलियन से ज्यादा रहा। भारत का निर्यात करीब $4 से $4.1 बिलियन था, जबकि आयात $6.5 बिलियन से ज्यादा रहा, जिससे साफ ट्रेड गैप दिखता है।
ओमान को भारत के निर्यात काफ़ी डाइवर्सिफाइड हैं और इनमें एनर्जी और इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स की बड़ी हिस्सेदारी है। इसमें नाफ्था और पेट्रोल जैसे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स, मशीनरी, इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट और एयरक्राफ्ट पार्ट्स जैसे इंडस्ट्रियल गुड्स, और कैल्साइन्ड एल्युमिना, आयरन और स्टील जैसे मेटल्स और मिनरल्स शामिल हैं। इसके अलावा एग्रीकल्चर प्रोड्यूस, प्रोसेस्ड फूड, केमिकल्स और कंज्यूमर गुड्स भी निर्यात बास्केट का अहम हिस्सा हैं।
इम्पोर्ट साइड पर भारत मुख्य रूप से ओमान से एनर्जी से जुड़े प्रोडक्ट्स खरीदता है। इसमें क्रूड ऑयल, लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG), फ्यूल ऑयल और पेट्रोलियम कोक शामिल हैं। इसके अलावा यूरिया, अमोनिया और अन्य फर्टिलाइज़र इंटरमीडिएट्स जैसे एग्री इनपुट्स भी आयात किए जाते हैं।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
भारत-ओमान CEPA निवेशकों के लिए लंबी अवधि में एक पॉजिटिव संकेत देता है, भले ही इसका तुरंत मार्केट पर असर सीमित रहे। यह समझौता निर्यात विज़िबिलिटी बढ़ाता है, टैरिफ बैरियर्स कम करता है और गल्फ रीजन में भारत की ट्रेड मौजूदगी मजबूत करता है, जिससे निर्यात-ओरिएंटेड कंपनियों की कमाई में स्थिरता आती है।
समय के साथ जिन सेक्टर्स को फायदा मिल सकता है, उनमें इंजीनियरिंग गुड्स, ऑटो कंपोनेंट्स, टेक्सटाइल्स, केमिकल्स, इलेक्ट्रॉनिक्स और जेम्स एंड ज्वेलरी शामिल हैं। कम ड्यूटी से ओमान और आसपास के मार्केट्स में प्राइस कॉम्पिटिटिवनेस बढ़ेगी। मिडल ईस्ट में पहले से मौजूद या GCC रीजन में विस्तार की योजना बनाने वाली कंपनियों को धीरे-धीरे नए ऑर्डर और बेहतर मार्जिन का फायदा मिल सकता है।
भविष्य की बातें
भारत ओमान के लिए इलेक्ट्रॉनिक गुड्स का एक बड़ा सप्लायर बनने की दिशा में काम कर रहा है, ठीक वैसे ही जैसे उसकी भूमिका UAE में है। FY24 में $8.9 बिलियन से बढ़कर FY25 में $10.6 बिलियन तक पहुंच चुके बाइलेटरल ट्रेड को CEPA और तेज करने की उम्मीद है। 6,000 से ज्यादा जॉइंट वेंचर्स और $1.2 बिलियन से ज्यादा के टू-वे इन्वेस्टमेंट मजबूत आर्थिक सहयोग की नींव रखते हैं।
सरकारी अधिकारियों के मुताबिक, बेहतर मार्केट एक्सेस के चलते अगले 1 से 2 साल में भारत का ओमान को निर्यात कम से कम $2 बिलियन बढ़ सकता है।
व्यापक स्तर पर देखें तो ओमान CEPA भारत की ट्रेड डाइवर्सिफिकेशन स्ट्रैटेजी का हिस्सा है। गोल्ड, ऑयल एंड गैस जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में रियायतें सीमित रहने के बावजूद यह डील गल्फ रीजन में भारत की मौजूदगी को मजबूत करती है और अफ्रीका व अन्य नजदीकी बाजारों के लिए इस क्षेत्र को गेटवे के रूप में इस्तेमाल करने में मदद करती है। कतर, EU, चिली और अन्य देशों के साथ चल रही बातचीत के साथ-साथ यह समझौता भारत के ग्लोबल ट्रेड पार्टनरशिप बढ़ाने और कुछ चुनिंदा निर्यात डेस्टिनेशन्स पर निर्भरता कम करने के प्रयास को दर्शाता है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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