भारतीय स्टॉक मार्केट इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ डोमेस्टिक निवेशक और विदेशी निवेशकों (FII/FPI) का व्यवहार बिल्कुल अलग दिशाओं में चलता हुआ दिखाई दे रहा है। पिछले कुछ महीनों में विदेशी निवेशकों ने भारतीय इक्विटी मार्केट से बड़ी मात्रा में पैसा निकाला है, जबकि डोमेस्टिक संस्थागत निवेशक (DII) लगातार खरीदारी कर रहे हैं। इस बदलते परिदृश्य के पीछे कई आर्थिक और मार्केट से जुड़े फैक्टर्स हैं जो विदेशी निवेशकों को सतर्क कर रहे हैं।
यह स्थिति केवल किसी एक घटना या डेटा पॉइंट का परिणाम नहीं है, बल्कि कई ग्लोबल और डोमेस्टिक संकेतों का मिश्रित प्रभाव है। आइए समझते हैं कि आखिर ऐसा क्या हो रहा है कि विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी से दूरी बना रहे हैं।
क्या है मामला?
सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि विदेशी निवेशकों ने इतनी बड़ी सेलिंग क्यों शुरू कर दी है। उपलब्ध डेटा बताता है कि सिर्फ 2026 में ही 29 जनवरी 2026 तक FII/FPI ने भारतीय इक्विटी में ₹43,686.59 करोड़ की नेट सेलिंग की है। इसी अवधि में डोमेस्टिक संस्थागत निवेशकों ने लगभग ₹69,821.77 करोड़ की खरीदारी की, जिससे मार्केट पर दबाव कम हुआ, लेकिन FII की सेलिंग की गति फिर भी चिंता पैदा करती है।
विदेशी संस्थागत निवेशक, जो लंबे समय तक भारत की मार्केट रैली की रीढ़ माने जाते थे, अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सावधान दिखाई दे रहे हैं। 2025 के दौरान यह कैश सेगमेंट में 12 में से 8 महीनों में नेट सेलर रहे और पूरे साल में मिलकर उन्होंने ₹3,06,419.09 करोड़ की सबसे बड़ी वार्षिक इक्विटी बिकवाली दर्ज की। इसका सीधा प्रभाव यह हुआ कि निफ्टी 50 में FII की होल्डिंग घटकर 13-साल के निचले स्तर 24.1% तक पहुंच गई। FII के इस आक्रामक सेल-ऑफ ने मार्केट की गिरावट को और तेज़ किया, क्योंकि विदेशी पूंजी का निकलना अक्सर शॉर्ट-टर्म ट्रेंड को गहरा बनाता है।
FII सेलिंग का ट्रेंड क्या संकेत दे रहा है?
मोतीलाल रिसर्च 360 के अनुसार, भारत में विदेशी निवेशकों का रुख लगातार नकारात्मक रहा है। 2026 की शुरुआत में ही FII ने ₹43,686.59 करोड़ की नेट बिकवाली की है और निफ्टी –2.78% गिरा है। यह ट्रेंड पिछले वर्षों से जुड़ा हुआ है जहां 2025 में FII आउटफ्लो ₹3,06,419.09 करोड़, 2024 में ₹3,02,434.91 करोड़, और 2022 में ₹2,78,429.52 करोड़ रहा। दिलचस्प बात यह है कि कई बार विदेशी बिकवाली के बावजूद निफ्टी ने सकारात्मक रिटर्न दिया है, जैसे 2025 में 10.05%, 2024 में 8.75%, और 2023 में 20.03%। यह लगातार पैटर्न दिखाता है कि FII फ्लो और निफ्टी मूवमेंट का संबंध सीधा नहीं है, बल्कि मार्केट अब पूरी तरह FII-निर्भर नहीं रहा।
इन आंकड़ों से एक महत्वपूर्ण संकेत मिलता है: मार्केट की वास्तविक स्थिरता अब DII और रिटेल निवेशकों पर अधिक आधारित है। जब FII भारी मात्रा में बेचते हैं, तब डोमेस्टिक पूँजी का मजबूत प्रवाह निफ्टी को गिरने से रोकता है। यही वजह है कि 2025 और 2024 जैसे वर्षों में भारी FII सेलिंग के बावजूद मार्केट ने अच्छी बढ़त दिखाई। वहीं जिन वर्षों में FII सेलिंग अधिक और DII सपोर्ट कमजोर रहा जैसे 2022 वहाँ निफ्टी की बढ़त काफी सीमित रही।
DII फ्लो भारतीय मार्केट की नई ताकत दिखाता है?
डेटा के अनुसार, डोमेस्टिक संस्थागत निवेशक (DII) अब भारतीय शेयर मार्केट की सबसे मज़बूत रीढ़ बन चुके हैं। 2026 में अब तक DII की नेट खरीदारी ₹69,821.77 करोड़ रही है, जबकि 2025 में यह आंकड़ा अभूतपूर्व स्तर ₹7,88,184.38 करोड़ तक पहुँच गया। 2024 में DIIs ने ₹5,26,545.13 करोड़, 2023 में ₹1,84,650.23 करोड़, और 2022 में ₹2,76,698.72 करोड़ की नेट खरीदारी की थी। इन लगातार बढ़ते आंकड़ों से यह साफ़ है कि डोमेस्टिक पूंजी का प्रवाह हर साल मजबूत हुआ है और यह निफ्टी की रैली का प्रमुख ड्राइवर बन चुका है निफ्टी 2018 के 10,862.55 से बढ़कर 2026 में 25,400 के आसपास ट्रेड कर रहा है।
यह डेटा एक गहरी स्ट्रक्चरल शिफ्ट को उजागर करता है: भारतीय मार्केट अब विदेशी निवेशकों पर निर्भर नहीं है, बल्कि डोमेस्टिक निवेशक ही इसकी स्थिरता और वृद्धि का मुख्य आधार बनते जा रहे हैं। 2020 जैसे चुनौतीपूर्ण वर्ष में जब DII ने –₹35,663.21 करोड़ की नेट सेलिंग की थी, निफ्टी का स्तर दबाव में था, लेकिन बाकी वर्षों में तेज़ और लगातार DII इनफ्लो ने मार्केट को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया है। यह एक स्पष्ट संकेत है कि भारत की बचत, SIP इनफ्लो और डोमेस्टिक संस्थाओं की लंबी अवधि की प्रतिबद्धता अब मार्केट को विदेशी उतार-चढ़ाव के प्रति पहले से कहीं ज़्यादा सुरक्षित बनाती है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
निवेशकों के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण बात है कि वे केवल बिकवाली के आंकड़े देखकर घबराएँ नहीं। कई बार FII की सेलिंग अर्थव्यवस्था के कमजोर होने का संकेत नहीं देती। यह अक्सर एक पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग प्रक्रिया होती है, जिसमें निवेशक विकसित मार्केट्स की ओर धन स्थानांतरित करते हैं।
डेटा पर नज़र डालें तो DII की मजबूत खरीदारी दिखाती है कि भारतीय निवेशकों का विश्वास अभी भी मज़बूत है। डोमेस्टिक फ्लो तेज होने और SIP इनफ्लोज़ के लगातार बढ़ने से बाजार को एक स्थिर सपोर्ट मिल रहा है। जब FII बड़े स्तर पर बेचते हैं, तो कई उच्च गुणवत्ता वाले स्टॉक्स बेहतर वैल्यूएशन पर उपलब्ध हो जाते हैं। यह स्थिति लॉन्गटर्म निवेशकों के लिए अवसर में बदल सकती है।
निवेशकों को यह भी समझना चाहिए कि विदेशी फ्लो अक्सर शॉर्ट-टर्म मैक्रो कंडीशंस पर आधारित होता है, जबकि डोमेस्टिक फ्लो भारत की ग्रोथ स्टोरी पर भरोसा रखता है। इसीलिए दोनों के फैसले एक-दूसरे से भिन्न हो सकते हैं।
भविष्य की बातें
आने वाले समय में विदेशी निवेशकों की दिशा काफी हद तक ग्लोबल मार्केट ट्रेंड पर निर्भर होगी और लेटेस्ट डेटा दिखाता है कि FIIs अब उन अर्थव्यवस्थाओं की ओर झुक रहे हैं जहाँ स्थिरता और तेज़ विस्तार दोनों मौजूद हैं। 2025 में चीन के CSI 300 ने 18% का रिटर्न दिया और दक्षिण कोरिया का Kospi 76% उछला, जो 1999 के बाद उसका सबसे अच्छा वर्ष रहा, और जापान का निक्केई 225 26% चढ़ा। इसके मुकाबले भारत का निफ्टी 50 केवल 10.5% रिटर्न दे पाया। यही कारण है कि FIIs ने बेहतर प्रदर्शन वाले मार्केट्स की ओर रुख किया, जैसे ब्राज़ील, जहाँ 39.4% की शानदार बढ़त ने विदेशी पूंजी को आकर्षित किया।
लेकिन इस ग्लोबल मूवमेंट के बीच, भारत की ताकत एक अलग दिशा से आई, डोमेस्टिक संस्थागत निवेशकों से। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार, म्यूचुअल फंड्स और बीमा कंपनियों जैसे DIIs ने मजबूत और स्थिर खरीदारी के माध्यम से FII की लगातार बिकवाली को काफी हद तक संतुलित किया है। रिपोर्ट बताती है कि Q4 FY25 में पहली बार DIIs की होल्डिंग वैल्यू ने FIIs को पीछे छोड़ दिया, और Q2 FY26 में DIIs की हिस्सेदारी 18.3% के साथ ऑल टाइम हाई स्तर पर पहुँच गई है। इसके मुकाबले FIIs की हिस्सेदारी घटकर 16.7%, यानी 13 साल के निचले स्तर, पर आ गई है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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