भारत की होर्मुज पर निर्भरता क्यों बनी बड़ी चुनौती?

भारत की होर्मुज पर निर्भरता क्यों बनी बड़ी चुनौती?
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भारत की आर्थिक मजबूती के सामने पश्चिम एशिया का एनर्जी संकट एक नई परीक्षा बनकर उभरा है। देश ने पिछले वर्षों में क्रूड ऑयल की सोर्सिंग को अलग-अलग देशों तक फैलाया है, लेकिन इंटरनेशनल प्राइस में तेज बढ़ोतरी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से सप्लाई बाधित होने का असर अब आयात बिल पर साफ दिखाई दे रहा है।

मौजूदा वित्त वर्ष की अप्रैल-जून तिमाही में भारत का क्रूड ऑयल आयात बिल सालाना आधार पर 60% से अधिक बढ़ गया। यह बढ़ोतरी ऐसे समय हुई, जब क्रूड आयात की वास्तविक मात्रा थोड़ी कम रही। इससे स्पष्ट है कि समस्या केवल सप्लाई की उपलब्धता नहीं, बल्कि बेहद हाई प्राइस पर एनर्जी खरीदने की भी है।

आइए भारत पर होर्मुज संकट के असर को विस्तारपूर्वक समझें और जानें कि बढ़ता एनर्जी आयात बिल अर्थव्यवस्था, कंपनियों और निवेशकों के लिए क्या संकेत देता है।

क्या है मामला?

पेट्रोलियम मंत्रालय के प्रोविजनल डेटा के अनुसार अप्रैल-जून तिमाही में भारत का क्रूड ऑयल आयात बिल 61.2% YoY बढ़कर 49.8 बिलियन डॉलर हो गया। इसके विपरीत, आयात वॉल्यूम 4.5% घटकर 59.8 मिलियन टन यानी लगभग 43.8 करोड़ बैरल रह गया।

आयात की मात्रा घटने के बावजूद बिल बढ़ने का मुख्य कारण क्रूड ऑयल की हाई लैंडेड कॉस्ट रही। जून तिमाही में भारत द्वारा आयात किए गए क्रूड की औसत प्राइस करीब 113 डॉलर प्रति बैरल रही, जबकि पिछले वर्ष की समान अवधि में यह लगभग 67 डॉलर प्रति बैरल थी। इस दौरान क्रूड ऑयल के लिए भारत की आयात डिपेंडेंसी 89.1% पर स्थिर रही।

भारत अपनी कुल क्रूड जरूरत का 88% से अधिक आयात करता है। प्राकृतिक गैस की लगभग आधी जरूरत LNG के रूप में विदेशों से पूरी होती है। ऐसे में ग्लोबल एनर्जी प्राइस में कोई भी बड़ा बदलाव सीधे भारत के आयात बिल और डोमेस्टिक लागत को प्रभावित करता है।

प्राइस ने कैसे बदला भारत का एनर्जी ट्रेड?

अप्रैल-जून में भारत का LNG आयात वॉल्यूम 8.6% घटकर 7,674 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर रह गया, जो पिछले वर्ष की समान अवधि में 8,396 मिलियन स्टैंडर्ड क्यूबिक मीटर था। हालांकि हाई प्राइस के कारण LNG आयात बिल लगभग 6% बढ़कर 3.6 बिलियन डॉलर हो गया।

पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स का आयात वॉल्यूम भी करीब 42% घटकर 7.1 मिलियन टन रह गया। लेकिन वैल्यू के लिहाज से गिरावट केवल 27.6% रही और आयात बिल 4.2 बिलियन डॉलर रहा। इसकी वजह LPG जैसे प्रमुख प्रोडक्ट्स की सीमित सप्लाई और हाई इंटरनेशनल प्राइस थीं।

भारत के पेट्रोलियम प्रोडक्ट निर्यात की मात्रा भी 15 मिलियन टन से घटकर 11.3 मिलियन टन रह गई। डोमेस्टिक सप्लाई को प्राथमिकता देने से निर्यात वॉल्यूम में लगभग 25% की कमी आई, लेकिन हाई ग्लोबल प्राइस के कारण निर्यात वैल्यू करीब 40% बढ़ गई। कुल मिलाकर भारत का नेट ऑयल और गैस आयात 45.3% बढ़कर 44.9 बिलियन डॉलर पहुंच गया।

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होर्मुज पर निर्भरता और सप्लाई की चुनौती

भारत के लगभग 40% क्रूड ऑयल, 60% LNG और 90% LPG आयात पश्चिम एशिया से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आते हैं। इस महत्वपूर्ण शिपिंग रूट पर ट्रैफिक बाधित होने से भारत को महंगी प्राइस पर वैकल्पिक सप्लाई सुरक्षित करनी पड़ रही है।

भारत ने अपनी क्रूड सोर्सिंग को रूस सहित अन्य देशों तक फैलाया है। जुलाई में रूस से आयात 26 लाख बैरल प्रतिदिन रहा, जबकि जून में यह रिकॉर्ड 27 लाख बैरल प्रतिदिन था। रूसी क्रूड पर 4 से 5 डॉलर प्रति बैरल का डिस्काउंट भारतीय रिफाइनर्स के लिए कुछ राहत दे रहा है।

फिर भी जोखिम पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। सितंबर डिलीवरी वाला ब्रेंट क्रूड 88.10 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचकर पांच सप्ताह के उच्च स्तर पर था। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के अलावा UAE, ओमान और सऊदी बिलियन के वैकल्पिक पोर्ट्स तथा रेड सी रूट पर भी खतरा बढ़ने से सप्लाई चेन पर दबाव बना रह सकता है।

निवेशकों के लिए इसमें क्या है?

हाई क्रूड प्राइस भारत के ट्रेड बैलेंस, करेंट अकाउंट डेफिसिट, रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ा सकती हैं। अप्रैल में फ्यूल और पावर की होलसेल महंगाई 25%, मई में 30.3% और जून में 27.4% रही। भारत सालाना 1.8 से 2 बिलियन बैरल क्रूड इंपोर्ट करता है। इसलिए क्रूड में प्रत्येक 1 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से सालाना इंपोर्ट बिल लगभग 2 बिलियन डॉलर बढ़ सकता है, जबकि ऑयल प्राइस में 10% वृद्धि करेंट अकाउंट डेफिसिट को GDP के 0.4% तक बढ़ा सकती है।

निवेशकों को एविएशन, पेंट्स, केमिकल्स, टायर, लॉजिस्टिक्स और गैस आधारित कंपनियों की इनपुट कॉस्ट, मार्जिन और प्राइसिंग पावर पर नजर रखनी चाहिए। वहीं, मजबूत सप्लाई नेटवर्क, अलग-अलग स्रोतों से क्रूड खरीदने की क्षमता और बेहतर रिफाइनिंग मार्जिन वाली एनर्जी कंपनियां अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन कर सकती हैं। हालांकि असर कंपनी की सोर्सिंग रणनीति और बढ़ी लागत को ग्राहकों तक पास करने की क्षमता पर निर्भर करेगा।

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भविष्य की बातें

भारत की अर्थव्यवस्था फिलहाल एनर्जी शॉक को अपेक्षाकृत बेहतर तरीके से संभाल रही है। क्रूड सप्लाई को 27 से बढ़ाकर 41 देशों तक डायवर्सिफाई करने, अलग-अलग ग्रेड प्रोसेस करने वाली रिफाइनिंग कैपेसिटी और डोमेस्टिक फ्यूल सप्लाई को बनाए रखने से बड़े स्तर पर बाधा नहीं आई। FY26 में GDP ग्रोथ 7.7% रही, जबकि FY27 के लिए कुछ अनुमानों को बढ़ाकर करीब 6.8% किया गया है।

फिर भी आगे का जोखिम खत्म नहीं हुआ है। रुपये पर दबाव, रूसी क्रूड पर कम होता डिस्काउंट और पश्चिम एशिया में दोबारा बढ़ता तनाव ऑयल प्राइस को अस्थिर रख सकता है। सरकार हर बार टैक्स कटौती या सरकारी ऑयल कंपनियों के मार्जिन के सहारे रिटेल फ्यूल प्राइस को लंबे समय तक स्थिर नहीं रख सकती है। ऐसे में भारत को क्रूड सोर्सिंग और स्ट्रैटेजिक रिजर्व बढ़ाने के साथ एथेनॉल, इलेक्ट्रिफिकेशन और वैकल्पिक एनर्जी के जरिए आयात निर्भरता कम करनी होगी।

डिस्क्लेमर: यह आर्टिकल केवल एजुकेशनल और इंफॉर्मेशनल उद्देश्य के लिए है और यह इन्वेस्टमेंट एडवाइस या किसी भी सिक्योरिटीज को खरीदने या बेचने की रिकमेंडेशन नहीं है। यहाँ जिन कंपनियों का उल्लेख किया गया है, उन्हें मार्केट डेवलपमेंट्स के संदर्भ में केवल उदाहरण के रूप में बताया गया है। इन्वेस्टर्स को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी इन्वेस्टमेंट डिसीजन लेने से पहले अपनी खुद की रिसर्च करें और अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से परामर्श करें।

सिक्योरिटीज मार्केट में किए गए इन्वेस्टमेंट मार्केट जोखिम के अधीन होते हैं। इन्वेस्ट करने से पहले सभी संबंधित डॉक्यूमेंट्स को ध्यानपूर्वक से पढ़ें।

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