भारत की अर्थव्यवस्था उस ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ी है जहाँ वह तकनीकी आत्मनिर्भरता के एक नए युग में प्रवेश कर रही है। देश का लक्ष्य केवल चिप्स का उपभोक्ता बने रहना नहीं, बल्कि 2035 तक दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण सेमीकंडक्टर देशों की श्रेणी में शामिल होना है। यह विज़न भारत की तकनीकी संप्रभुता और ग्लोबल सप्लाई चेन में इसकी भूमिका को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखता है।
आर्थिक विश्लेषण और सरकारी अनुमान बताते हैं कि भारत अगले कुछ वर्षों में चिप मैन्युफैक्चरिंग और डिजाइन के क्षेत्र में अपनी गहरी पैठ बना लेगा। यह महत्वाकांक्षा केवल कागजों तक सीमित नहीं है, बल्कि ठोस नीतियों और लक्ष्यों पर आधारित है।
आइए जानें यह स्थिति स्टॉक मार्केट और निवेशकों के लिए क्या मायने रखती है।
क्या है मामला?
भारत अब उस दिशा में तेजी से बढ़ रहा है जहां वह आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे उन्नत चिप तकनीकों में अपनी पहचान बना सके। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, सरकार का लक्ष्य है कि 2032 तक देश में 3-नैनोमीटर नोड वाली अत्याधुनिक छोटी चिप्स बनाई जा सकें। वे ही चिप्स जो आज के आधुनिक स्मार्टफ़ोन और कंप्यूटर को शक्ति देती हैं। यह लक्ष्य न केवल तकनीकी क्षमता बढ़ाने का संकेत देता है, बल्कि भारत को ग्लोबल सेमिकंडक्टर मानचित्र पर एक नई जगह दिलाने की महत्वाकांक्षा भी दर्शाता है।
इसके साथ ही सरकार ने डिज़ाइन-लिंक्ड इंसेंटिव योजना के दूसरे चरण में चिप्स की छह महत्वपूर्ण श्रेणियों, कंप्यूट, रेडियो फ़्रीक्वेंसी, नेटवर्किंग, पावर, सेंसर और मेमोरी पर विशेष ध्यान केंद्रित करने की घोषणा की है। इन क्षेत्रों में मज़बूत पकड़ बनाने से भारतीय कंपनियों को 70 से 75% तकनीकी प्रोडक्ट्स के विकास पर नियंत्रण मिलेगा, जिससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होगी, बल्कि देश में एक स्वदेशी और प्रतिस्पर्धी हाई-टेक इकोसिस्टम भी तैयार होगा।
भारत के फ़ैबलेस चिप स्टार्टअप्स की नई उड़ान
डिज़ाइन लिंक्ड इंसेंटिव (DLI) योजना अब तक 24 स्टार्टअप्स को सक्षम बना चुका है। इनमें से कई अपने चिप डिज़ाइन का टेप-आउट पूरा कर चुके हैं, प्रोडक्ट्स को वैलिडेट कर चुके हैं और मार्केट में शुरुआती सफलता भी प्राप्त कर चुके हैं। यह प्रगति दिखाती है कि सेमिकंडक्टर स्टार्टअप्स के सामने आने वाली सबसे बड़ी बाधाओं एडवांस डिज़ाइन टूल्स, IP लाइब्रेरी, वेफ़र एक्सेस और टेप-आउट सपोर्ट को दूर करने का सरकारी मॉडल पूरी तरह सफल रहा है।
इसके साथ ही, इंडिया सेमिकंडक्टर मिशन द्वारा दिया गया समर्थन अब अगले चरण में और व्यापक होगा। सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले वर्षों में देश में कम से कम 50 फ़ैबलेस सेमिकंडक्टर कंपनियाँ विकसित की जाएँ, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर के अग्रणी प्लेयर्स की तरह प्रतिस्पर्धा कर सकें। केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने भरोसा जताया कि निकट भविष्य में भारत में ऐसे फ़ैबलेस कंपनियां उभरेंगी जो ग्लोबल सेमिकंडक्टर मानचित्र पर देश की मजबूत उपस्थिति दर्ज कराएंगे।
भारत की चिप निर्माण क्षमता क्यों महत्वपूर्ण हो रही है?
अनुमान है कि दुनिया के लगभग 20% सेमिकंडक्टर इंजीनियर भारत में हैं। मंत्रालय के संयुक्त सचिव अमितेश कुमार सिन्हा बताते हैं कि लगभग हर बड़ी ग्लोबल चिप कंपनी का सबसे बड़ा या दूसरा सबसे बड़ा डिज़ाइन केंद्र भारत में है। लेकिन कोविड-19 के दौरान चिप सप्लाई रुकने से इंडस्ट्री को जो झटका लगा, उसने यह साफ़ कर दिया कि केवल डिज़ाइन क्षमता काफी नहीं है।
इसीलिए भारत अब अपना स्वदेशी सेमिकंडक्टर इकोसिस्टम बना रहा है ताकि जोखिम कम हो और उत्पादन क्षमता बढ़े। चिप मैन्युफैक्चरिंग तीन चरणों में होता है डिज़ाइन, वेफ़र फ़ैब्रिकेशन और OSAT (असेंबली, टेस्ट और पैकेजिंग)। भारत डिज़ाइन में मजबूत है, फ़ैब्रिकेशन ताइवान जैसे देशों के पास है, और अब भारत का फोकस OSAT पर है।
भारत सेमिकंडक्टर एसोसिएशन के अध्यक्ष अशोक चंदक कहते हैं कि फ़ैब की तुलना में असेंबली और टेस्टिंग शुरू करना आसान होता है और इसी दिशा में भारत अपनी बुनियाद तैयार कर रहा है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
IMARC ग्रुप के अनुमान बताते हैं कि भारत का सेमिकंडक्टर मार्केट 2034 तक 177 बिलियन डॉलर के वैल्यू तक पहुँच सकता है, जो 2026 से 2034 के बीच 12.18% की मजबूत वार्षिक वृद्धि दर का संकेत देता है। यह आंकड़े दिखाते हैं कि सेमिकंडक्टर इंडस्ट्री अभी शुरुआती चरण में होते हुए भी आने वाले वर्षों में तेज़ विस्तार की क्षमता रखता है।
हालाँकि, यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें उत्साह और अटकलें दोनों ही प्रचुर मात्रा में हैं। इसलिए निवेशकों के लिए ज़रूरी है कि वे गहराई से मूल्यांकन करें और उन कंपनियों की पहचान करें जिनके पास सबसे मज़बूत फंडामेंटल बेस हैं।
भविष्य की बातें
केंद्रीय मंत्री श्री अश्विनी वैष्णव ने विश्वास जताया कि आने वाले वर्षों में ग्लोबल सेमिकंडक्टर डिज़ाइन का एक बड़ा हिस्सा भारत में तैयार होगा, क्योंकि देश के स्टार्टअप, इंजीनियर और नवाचारकर्ता अपने IP, पेटेंट और नई कंपनियाँ विकसित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह बदलाव भारत को सिर्फ उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक निर्माता के रूप में स्थापित करेगा।
आगे की दिशा बताते हुए मंत्री ने कहा कि 2029 तक भारत लगभग 70-75% डोमेस्टिक जरूरतों के लिए आवश्यक चिप्स को खुद डिज़ाइन और निर्मित करने की क्षमता हासिल कर लेगा। इसी आधार पर सेमिकॉन 2.0 का अगला चरण एडवांस मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों पर केंद्रित होगा, जिसमें 3-नैनोमीटर और 2-नैनोमीटर स्तर तक पहुँचने का स्पष्ट रोडमैप तैयार है।
भारत का लक्ष्य है कि 2035 तक वह दुनिया के प्रमुख सेमिकंडक्टर देशों में शामिल हो, एक ऐसा स्थान जो आने वाले दशक में भारत की तकनीकी पहचान को पूरी तरह बदल सकता है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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