भारत में बिजली की डिमांड तेजी से बढ़ रही है, सिर्फ गर्मियों में ही नहीं बल्कि पूरे साल भर। यह वृद्धि शहरों, इंडस्ट्रीज और AI जैसी नई तकनीकों द्वारा प्रेरित है। हालांकि क्लीन एनर्जी बढ़ रही है, लेकिन थर्मल पावर अभी भी बिजली का मुख्य स्रोत है। कोयला आधारित बिजलीघर देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था को सपोर्ट करने और बिजली सप्लाई बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं।
राष्ट्रीय थर्मल इंजीनियरिंग दिवस (24 जुलाई) के अवसर पर, आइए भारत के थर्मल पावर सेक्टर को विस्तार से समझें और देखें कि क्या यह ग्रीन एनर्जी के बढ़ते दौर में भी एक मजबूत अवसर प्रदान करता है।
भारत की थर्मल एनर्जी की वर्तमान स्थिति
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बिजली उत्पादक और उपभोक्ता देश है। जून 2025 तक, देश की कुल स्थापित पावर क्षमता 484.82 GW तक पहुंच गई। इसमें से 242.04 GW यानी लगभग 49.92% अभी भी थर्मल स्रोतों से आता है।
कोयला बिजली उत्पादन का मुख्य फ्यूल है। यह अकेले कुल उत्पन्न बिजली का लगभग 70.34% योगदान देता है। वास्तव में, पारंपरिक बिजली (कोयला) उत्पादन FY16 में 896.30 बिलियन यूनिट्स से बढ़कर FY25 में 1,331.87 बिलियन यूनिट्स हो गया।

भारत में 50% से अधिक स्थापित बिजली क्षमता ग्रीन एनर्जी से होने के बावजूद, वास्तविक बिजली उत्पादन के लिए अभी भी कोयले पर बहुत अधिक निर्भरता है।
हालांकि सोलर, विंड, हाइड्रो और न्यूक्लियर जैसे नॉन-फॉसिल फ्यूल स्रोत भी बढ़े हैं और अब स्थापित क्षमता का आधे से ज्यादा हिस्सा बनाते हैं, फिर भी थर्मल पावर की अग्रणी भूमिका बनी हुई है। भारत ने बिजली पहुंच में भी काफी सुधार किया है। 2.8 करोड़ से ज्यादा घरों को बिजली दी गई और प्रति व्यक्ति बिजली उपयोग लगभग 46% बढ़ गया। साथ ही, बिजली की कमी 2013-14 में 4.2% से घटकर 2024-25 में केवल 0.1% रह गई।
थर्मल पावर अभी भी क्यों महत्वपूर्ण है?
हालांकि भारत सोलर और विंड एनर्जी को बढ़ावा दे रहा है, लेकिन थर्मल पावर बिजली ग्रिड का आधार बना हुआ है। रिन्यूएबल स्रोत अभी 24 घंटे बिजली सप्लाई नहीं दे सकते। दिल्ली, हैदराबाद और मुंबई जैसे शहरों में गर्मियों के पीक समय में बिजली कटौती से पता चलता है कि थर्मल एनर्जी कितनी महत्वपूर्ण है।
सरकार 2032 तक 80 GW नई थर्मल क्षमता जोड़ने की योजना बना रही है, जिसमें 2.75 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के टेंडर्स हैं। लेकिन प्रगति धीमी है और FY25 में केवल 4.53 GW जोड़ा गया, जो 15.4 GW के लक्ष्य से काफी कम है। साथ ही, 22 नियोजित यूनिट्स में से केवल छह शुरू हो पाईं है।
यह केवल भारत की समस्या नहीं है। जर्मनी, जापान और अमेरिका जैसे देश भी ऐसी ही समस्याओं का सामना कर रहे हैं। रूसी गैस संकट के बाद, जर्मनी ने ग्रिड को स्थिर रखने के लिए कोयला प्लांट्स फिर से शुरू किए। जापान सप्लाई सुरक्षा के लिए थर्मल और गैस आधारित क्षमता बना रहा है।
ग्रीन एनर्जी ने थर्मल को पीछे छोड़ा
30 जून तक, भारत ने एक बड़ी उपलब्धि की घोषणा की कि देश की स्थापित बिजली का 50.08% अब नॉन-फॉसिल फ्यूल स्रोतों से आता है। इसमें सोलर, विंड, हाइड्रो और न्यूक्लियर पावर शामिल हैं, और यह एक प्रमुख जलवायु लक्ष्य को पांच साल पहले हासिल करने की उपलब्धि है।
ज्यादा जानने के लिए, विस्तृत कवरेज पढ़ें ‘भारत ने रचा ग्रीन इतिहास: क्लीन एनर्जी से 50% बिजली!’
भारत के थर्मल सेक्टर की मुख्य चुनौतियां
भारत का थर्मल पावर सेक्टर कई प्रमुख चुनौतियों का सामना कर रहा है:
- ग्रिड अस्थिरता: सोलर और विंड की तेज वृद्धि बिना पर्याप्त स्टोरेज के ग्रिड को अस्थिर कर रही है, खासकर पीक डिमांड या रिन्यूएबल सप्लाई कम होने पर। थर्मल प्लांट्स को मजबूरी में हस्तक्षेप करना पड़ता है, जिससे ऑपरेशंस पर दबाव पड़ता है।
- पर्यावरण नियमों की लागत: FGD जैसे प्रदूषण नियंत्रण नियमों ने थर्मल प्लांट्स की लागत बढ़ा दी है। हाल ही में कुछ नियमों में ढील दी गई, लेकिन पर्यावरण संबंधी चिंताएं और भविष्य के नियम जोखिम बने हुए हैं।
- बढ़ती डिमांड बनाम क्षमता की कमी: शहरों, EVs और इंडस्ट्रीज के कारण बिजली की डिमांड तेजी से बढ़ रही है। कई राज्य विश्वसनीय थर्मल पावर के लिए लंबी अवधि के सौदे कर रहे हैं, लेकिन नई क्षमता का बड़ा हिस्सा अभी निर्माणाधीन है।
- कोयले की सप्लाई और कीमत का जोखिम: बेहतर डोमेस्टिक कोयला उत्पादन के बावजूद, प्लांट्स को गुणवत्ता की समस्याओं का सामना करना पड़ता है और जरूरत पड़ने पर महंगा आयातित कोयला लेना पड़ता है। डिमांड बढ़ने या खराब मौसम में सप्लाई और लागत अनिश्चित रहती है।
- वित्तीय परेशानियां: पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों पर बड़ा कर्ज है और उन्हें भारी नुकसान हो रहा है। उनकी कमजोर वित्तीय स्थिति थर्मल पावर उत्पादकों के भुगतान को प्रभावित करती है, जिससे सेक्टर की स्थिरता पर असर पड़ता है।
- पुराने प्लांट्स: कई कोयला प्लांट्स पुराने हैं और कम दक्षता के साथ काम करते हैं। ये अक्सर खराब हो जाते हैं और ज्यादा उत्सर्जन करते हैं, हालांकि हाल के वर्षों में प्रदर्शन में थोड़ा सुधार हुआ है।
सरकारी पहल
- 100% FDI पावर सेक्टर में अनुमति: सरकार स्वचालित मार्ग से पूर्ण विदेशी निवेश की अनुमति देती है, जिसमें थर्मल पावर प्रोजेक्ट्स भी शामिल हैं, ताकि ग्लोबल पूंजी आकर्षित हो सके।
- सुपरक्रिटिकल टेक्नोलॉजी को बढ़ावा: थर्मल प्लांट्स उच्च दक्षता और कम उत्सर्जन के लिए अल्ट्रा-सुपरक्रिटिकल तकनीक अपना रहे हैं। कोल इंडिया जैसी कंपनियां कोयला खदानों के पास ऐसे प्लांट्स में निवेश कर रही हैं ताकि लागत कम हो।
- बायोमास को-फायरिंग पॉलिसी: सभी थर्मल पावर प्लांट्स को प्रदूषण कम करने और कृषि अपशिष्ट का उपयोग करने के लिए कोयले के साथ 5% से 7% बायोमास मिलाना अनिवार्य है।
- पुराने प्लांट्स का प्रतिस्थापन: पुराने और अक्षम थर्मल यूनिट्स को बंद करके आधुनिक पावर प्लांट्स से बदला जा रहा है, ताकि ऊर्जा उत्पादन बेहतर हो और उत्सर्जन कम हो।
- FGD इंस्टालेशन में छूट: 2025 में, भारतीय कोयले में कम सल्फर होने के कारण अधिकांश प्लांट्स को फ्लू गैस डिसल्फराइजेशन सिस्टम लगाने से छूट दी गई।
- कोयला स्टॉक रखरखाव: सरकार उच्च डिमांड के दौरान प्लांट्स पर पर्याप्त कोयला भंडार सुनिश्चित करती है, ताकि बिजली की कमी न हो।
वॉचलिस्ट में शामिल करने योग्य स्टॉक्स

भविष्य की बातें
भारत 2028 तक थर्मल पावर में अपने निवेश को दोगुना करके 2.3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचाने वाला है। साथ ही, सरकार 2032 तक 80 GW नई थर्मल क्षमता जोड़ने की योजना बना रही है। वर्तमान में, 60 GW पाइपलाइन में है, जिसमें से 19 GW प्राइवेट प्लेयर्स से आएगा।
थर्मल पावर में प्राइवेट सेक्टर का निवेश अगले तीन वर्षों में 7-8% से बढ़कर लगभग एक तिहाई हो जाएगा, हालांकि अधिकांश प्रोजेक्ट्स 2028 के बाद ही ऑपरेशनल होंगे क्योंकि इन्हें बनने में लंबा समय लगता है।
रिन्यूएबल एनर्जी के बढ़ते प्रचलन के बावजूद, थर्मल पावर स्थिर बेस लोड के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है, और कई राज्यों ने एक दशक बाद 25-वर्षीय पावर डील्स पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके अलावा, नए थर्मल पावर प्रोजेक्ट्स के लिए टैरिफ लगभग 5.5 से 5.8 रुपये प्रति यूनिट है, जो समय पर पूरा होने पर लगभग 15% का रिटर्न देता है।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर