भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी निवेशकों का भरोसा डगमगाता दिख रहा है। सितंबर 2025 के पहले सप्ताह में ही फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर्स (FPIs) ने ₹12,257 करोड़ की भारी बिकवाली की है। यह आंकड़ा न सिर्फ चिंताजनक है, बल्कि एक बड़े ट्रेंड का हिस्सा है जो साल 2025 की शुरुआत से जारी है।
लेकिन ऐसी क्या वजह है जिसके कारण FPIs का बिकवाली का सिलसिला रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है आइए समझते है।
क्या है मामला?
भारतीय इक्विटी मार्केट में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की बिकवाली थमने का नाम नहीं ले रही है। सिर्फ सितंबर 2025 के पहले सप्ताह में ही ₹12,257 करोड़ की निकासी हुई, जिससे साल की शुरुआत से अब तक कुल आउटफ्लो ₹1.43 लाख करोड़ तक पहुंच गया है। अगस्त में FPIs ने ₹34,993 करोड़ और जुलाई में ₹17,741 करोड़ की बिकवाली की थी।

यह ट्रेंड FY26 में भी जारी है। अप्रैल-जून 2025 के दौरान कैपिटल इनफ्लो पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 40% से ज्यादा गिर गया, जबकि इसी तिमाही में GDP ग्रोथ 7.8% रही थी।
अगर पिछले पांच साल के आंकड़े देखें, तो 2020 में ₹1,70,262 करोड़ और 2023 में ₹1,71,107 करोड़ का मजबूत इनफ्लो देखने को मिला था। लेकिन 2022 भारी आउटफ्लो ₹1,21,439 करोड़ और 2024 में मात्र ₹427 करोड़ के मामूली इनफ्लो ने विदेशी निवेशकों की अनिश्चितता को साफ दिखाया है।
ग्लोबल फैक्टर्स और डॉलर का दबाव
भारतीय मार्केट से विदेशी निवेशकों के बाहर जाने की एक बड़ी वजह ग्लोबल फैक्टर्स हैं। सबसे पहले, मजबूत अमेरिकी डॉलर रुपये को कमजोर करता है, जिससे निवेशकों का झुकाव भारत से हटकर US एसेट्स की ओर बढ़ जाता है।
दूसरा, अमेरिकी टैरिफ को लेकर नई आशंकाएं ग्लोबल अनिश्चितता को और गहरा कर रही हैं। जब व्यापारिक माहौल अस्थिर होता है, तो फॉरेन कैपिटल फ्लो इमर्जिंग मार्केट्स से कम हो जाता है।
तीसरा, लगातार बने जियोपॉलिटिकल तनाव निवेशकों के बीच ‘रिस्क-ऑफ’ सेंटिमेंट को जन्म देते हैं। इसका मतलब है कि निवेशक जोखिम लेने से बचते हुए सुरक्षित मार्केट्स की ओर रुख करते हैं।
डोमेस्टिक चुनौतियां और वैल्यूएशन कंसर्न
भारतीय मार्केट से FPIs के बाहर जाने में डोमेस्टिक फैक्टर्स भी अहम भूमिका निभा रहे हैं। जून तिमाही की कमजोर अर्निंग्स ने निवेशकों का सेंटिमेंट कमजोर किया है। इसके चलते निवेशक सुरक्षित और अन्य विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
इसके साथ ही, द हिंदू के अनुसार, जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट V.K विजयकुमार का कहना है कि “निरंतर बड़े पैमाने पर DII खरीदारी FPIs को ऊंची वैल्यूएशन पर एनकैश करने और चीन, हांगकांग और साउथ कोरिया जैसे सस्ते मार्केटों में पैसा ले जाने में मदद कर रही है”।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
अगस्त 2025 में भारतीय मार्केट्स में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने मिली-जुली गतिविधि दिखाई है। IT सेक्टर में ₹112.9 बिलियन, ऑइल और गैस से ₹61 बिलियन और फाइनेंशियल्स से ₹232.9 बिलियन की बिकवाली हुई, जो चिंता का विषय रही। वहीं, टेलीकॉम सेक्टर में मोबाइल टैरिफ वृद्धि के बाद बेहतर आय की उम्मीद से विदेशी निवेश आकर्षित हुआ, जिससे ₹57.7 बिलियन का निवेश दर्ज हुआ। कंस्ट्रक्शन (₹13.6 बिलियन), ऑटो (₹18 बिलियन), कैपिटल गुड्स (₹19 बिलियन) और सर्विसेज (₹23.5 बिलियन) सेक्टर्स में भी पॉजिटिव फ्लो देखा गया।
रॉयटर्स के अनुसार, एनालिस्ट का मानना है कि भारत की मजबूत मैक्रो-इकनॉमिक नींव और GST दरों में कटौती से कंजम्पशन बढ़ने के साथ बिकवाली का दबाव धीरे-धीरे कम होगा।
भविष्य की बातें
आने वाले समय में भारतीय मार्केट की दिशा ग्लोबल डेटा और डोमेस्टिक मैक्रो इंडीकेटर्स से तय होगी। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, 12 सितंबर को आने वाला अगस्त का महंगाई डेटा, साथ ही अमेरिका के प्रमुख आर्थिक आंकड़े जैसे कंज्यूमर इन्फ्लेशन और इनिशियल जॉबलेस क्लेम्स, FPI फ्लो को प्रभावित करेंगे। इसके अलावा, 16-17 सितंबर की US फेडरल रिजर्व पॉलिसी मीटिंग, क्रूड ऑयल की प्राइस और रुपया-डॉलर का ट्रेंड भी मार्केट के लिए महत्वपूर्ण ड्राइवर होंगे।
हाल की बिकवाली ने मार्केट पर दबाव डाला है, लेकिन कुछ स्ट्रैटेजिस्ट अब भी सकारात्मक संभावनाएं देखते हैं। द इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के V.K विजयकुमार का मानना है कि GST सुधार और मजबूत GDP ग्रोथ FY26 और FY27 की अर्निंग ग्रोथ को ऊपर ले जा सकते हैं, जिससे FPIs फिर से भारत में खरीदारी कर सकते हैं और मार्केट में रैली शुरू हो सकती है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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