भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास तेजी से हो रहा है, और इसके लिए बड़े पैमाने पर फंडिंग की आवश्यकता होती है। बैंक्स और नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनियों (NBFCs) की भूमिका इसमें अहम होती है। लेकिन लंबे समय से सख्त रेगुलेटरी नियमों के कारण इन संस्थानों को प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
अब RBI ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। आइए, इस आर्टिकल में हम समझेंगे कि RBI के इस फैसले का क्या अर्थ है, किन कंपनियों को इससे सबसे अधिक लाभ मिलेगा और आगे इसका क्या असर पड़ सकता है।
क्या है मामला?
भारतीय रिजर्व बैंक ने 19 जून को प्रोजेक्ट फाइनेंसिंग के लिए नए नियम जारी किए हैं जो बैंक्स और NBFCs के लिए राहत भरा संदेश लेकर आए हैं। ये नियम नए प्रोजेक्ट लोन पर लागू होंगे और पुराने प्रोजेक्ट्स पर कोई असर नहीं डालेंगे। पहले मई 2024 में RBI ने सख्त नियमों का ड्राफ्ट पेश किया था, लेकिन 70 एंटिटी (बैंक्स, NBFC, इंडस्ट्री बॉडी, और सरकार आदि) की राय लेने के बाद नियमों को आसान बनाया गया।
यह निर्णय बैंकिंग क्षेत्र के लिए एक बड़ी राहत है क्योंकि मई 2024 के ड्राफ्ट प्रस्ताव में ऑपरेशनल चरण के दौरान 5% प्रावधान की बात कही गई थी। इस छूट से बैंक्स की पूंजी की लागत कम होगी और उन्हें अधिक प्रोजेक्ट्स को फाइनेंस करने में मदद मिलेगी।
RBI ने प्रोजेक्ट फाइनेंस प्रोविजनिंग नियमों को आसान किया
RBI के दिशा-निर्देशों के अनुसार, निर्माण चरण के दौरान, बैंक्स को अब कमर्शियल रियल एस्टेट (CRE) के लिए केवल 1.25% और कमर्शियल रियल एस्टेट-रेजिडेंशियल हाउसिंग (CRE-RH) तथा अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 1% प्रोविजनिंग रखनी होगी। इसके अलावा, जब प्रोजेक्ट ऑपरेशनल हो जाता है और लोन रिपेमेंट शुरू हो जाती है, तो आवश्यकता और कम हो जाती है। इस स्थिति में बैंक्स को CRE के लिए केवल 1%, CRE-RH के लिए 0.75% और अन्य सभी प्रोजेक्ट्स के लिए 0.40% प्रोविजनिंग रखनी होगी।

ये प्रोविजनिंग स्तर पहले के ड्राफ्ट दिशा-निर्देशों की तुलना में काफी कम हैं। ड्राफ्ट में निर्माण चरण के दौरान 5% प्रोविजनिंग का सुझाव दिया गया था, जो प्रोजेक्ट पूरा होने के बाद 2.5% और लोन चुकाने के लिए पर्याप्त कैश फ्लो शुरू होने पर 1% हो जाती है।
RBI ने DCCO एक्सटेंशन और NPA नियमों को सरल बनाया
RBI ने बैंक्स को इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए डेट ऑफ कमेंसमेंट ऑफ कमर्शियल ऑपरेशंस (DCCO) को 3 साल तक और नॉन-इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए 2 साल तक बढ़ाने की अनुमति दी है।
इसके अलावा, दिशा-निर्देशों के मुताबिक, अगर किसी प्रोजेक्ट का DCCO टाल दिया जाता है लेकिन उसे स्टैंडर्ड श्रेणी में रखा जाता है, तो बैंक्स को इंफ्रास्ट्रक्चर लोन के लिए 0.375% प्रति तिमाही और नॉन-इंफ्रास्ट्रक्चर लोन (CRE और CRE-RH सहित) के लिए 0.5625% प्रति तिमाही अतिरिक्त प्रोविजनिंग रखनी होगी।
RBI ने यह भी स्पष्ट किया है कि अगर कोई NPA (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट) घोषित प्रोजेक्ट डाउनग्रेड हो जाता है, तो उसे तभी अपग्रेड किया जा सकता है जब एक्चुअल DCCO के बाद प्रोजेक्ट अच्छा प्रदर्शन करे। प्रोजेक्ट को अपग्रेड तभी करने की अनुमति होगी जब रिजॉल्यूशन प्लान सफलतापूर्वक लागू हो जाए और कोई और DCCO एक्सटेंशन न मांगा जाए।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
नए नियमों के तहत, बैंक्स और NBFCs को प्रोविजनिंग के रूप में कम पैसा रखना होगा। इससे NBFCs पर वित्तीय दबाव कम होगा और उन्हें बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए लोन देने में ज्यादा फ्लेक्सिबिलिटी मिलेगी।
ये बदलाव अचानक होने वाले नुकसान के जोखिम को भी कम करते हैं और बैंक्स व NBFCs को ज्यादा स्थिर दिखाते हैं, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ता है। एनालिस्ट और ब्रोकरेज फर्म्स की सकारात्मक राय से भी मजबूत भावना बनती है, जिससे शेयर की प्राइस बढ़ सकती हैं और निवेशकों को फायदा हो सकता है।
बिजनेस टुडे के अनुसार, एनालिस्ट का मानना है कि मौजूदा लोन बुक पर असर सीमित है, फिर भी प्रोविजनिंग नियमों में छूट एक सकारात्मक कदम है। इसके अलावा, मोतीलाल ओसवाल फाइनेंशियल सर्विसेज (MOFSL) ने इस सेक्टर पर सकारात्मक नजरिया बनाए रखा है, हालांकि इसका उनकी प्रॉफिटेबिलिटी और बैलेंस शीट पर नगण्य असर होगा।
भविष्य की बातें
RBI की अंतिम प्रोजेक्ट फाइनेंस गाइडलाइंस ने भारत के NBFC सेक्टर को बड़ी नीतिगत स्पष्टता प्रदान की है। ये नए नियम केवल 1 अक्टूबर 2025 के बाद फाइनेंशियल क्लोजर पाने वाले प्रोजेक्ट्स पर लागू होंगे। जो प्रोजेक्ट्स पहले ही इस तारीख से पहले फाइनेंशियल क्लोजर हासिल कर चुके हैं, वे पुराने नियमों के अंतर्गत ही रहेंगे।
कुल मिलाकर, RBI के इन संशोधित नियमों से NBFC सेक्टर को मजबूती मिलेगी और भारत के इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास को गति मिलने की संभावना है। साथ ही, यह कदम वित्तीय संस्थानों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था के लिए भी सकारात्मक साबित हो सकता है।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर