क्या PSU का बढ़ना अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है?

सरकारी कंपनियां अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं, लेकिन क्या यह अर्थव्यवस्था के लिए खतरा है? जानें कम प्राइवेट निवेश कैसे विकास में बाधा डाल सकता है।
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पिछले कुछ वर्षो में भारतीय स्टॉक मार्केट ने PSU स्टॉक्स ने बेहतर प्रदर्शन किया है जिसे आप इससे समझ सकते है कि BSE PSU इंडेक्स ने इस साल लगभग 43.71% का रिटर्न दिया हैं और पिछले तीन साल में लगभग 187.29% का रिटर्न दिया है।

लेकिन असल मुद्दा ये है कि क्या ये ग्रोथ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छी खबर नहीं है? और यह स्थिति भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए भविष्य में क्या मायने रखती है, आइए इस पर गौर करें।

क्या है मामला?

PSU कंपनियां बहुत अच्छा प्रदर्शन कर रही है इसमें कोई शक नहीं है लेकिन ये PSU ज्यादातर फॉसिल फ्यूल और ओल्ड ट्रांसपोर्ट जैसे सनसेट इंडस्ट्रीज में हैं और ये सरकारी कंपनियां खुद में ही फिर से निवेश कर रही हैं, वहीं प्राइवेट सेक्टर का निवेश चिंताजनक रूप से कम है।

अब सवाल यह आता है कि क्या PSU कंपनियों का प्रदर्शन की वजह से प्राइवेट सेक्टर में ग्रोथ और निवेश की रफ्तार धीरे हो रही है, क्योंकि इन PSU कंपनियों में ज्यादातर कंपनियां ऐसी है जो अपनी इंडस्ट्री में मोनोपॉली रखती है या मोनोपॉली के करीब है। जो कि सेक्टर की कंपनियों के लिए अच्छी बात नहीं है।

इसका मतलब साफ है कि सरकारी सेक्टर का अच्छा प्रदर्शन जरूरी नहीं कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक संकेत हो। इसलिए भारत को प्राइवेट सेक्टर के प्रदर्शन पर ध्यान देने की जरूरत है।

प्राइवेट सेक्टर के निवेश में गिरावट

भारतीय अर्थव्यवस्था में एक अनोखी स्थिति बन रही है। जहां सरकारी कंपनियां (PSU) मुनाफे में चल रहीं हैं, वहीं प्राइवेट सेक्टर संघर्ष कर रहा है। पिछले साल प्राइवेट सेक्टर के नए निवेश में 15% से ज्यादा की गिरावट आई है, खासकर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में ये गिरावट 40% तक पहुंच गई थी।

कुछ का कहना है कि डोमेस्टिक डिमांड अभी इतनी मजबूत नहीं है, इस लिए प्राइवेट सेक्टर में निवेश फ्लो कम है, जबकि दूसरों का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग प्रोडक्टिविटी में कोई खास बढ़ोत्तरी नहीं हुई है, इसलिए इस क्षेत्र में नई पूंजी नहीं आई है। साथ ही, इस बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि बिज़नेस रिफार्म उतने पर्याप्त नहीं हैं, जितने होने चाहिए।

सरकारी क्षेत्र पर निर्भरता

एक और फंडामेंटल समस्या यह है कि पिछले दो कार्यकालों में मोदी सरकार ने आर्थिक विकास के लिए एक रणनीति बनाई है – और प्राइवेट क्षेत्र को इसमें मुख्य भूमिका नहीं दी गई है। ऐसा देखा गया है कि सरकार डोमेस्टिक बचत को सरकारी क्षेत्र में निवेश करती है।

अगर हम GDP के अनुपात में समझें तो सरकारी खर्च तेजी से बढ़ा है, साथ ही भारत का कर्ज भी। वित्त मंत्रालय के थिंक टैंक का अनुमान है कि आने वाले वर्ष में विकास दर 7.1% -7.4% रहने की संभावना है, जो मुख्य रूप से पब्लिक सेक्टर में किए गए कैपिटल एक्सपेंडिचर की वजह से होगा।

निवेशकों के लिए क्या मायने रखता है?

प्राइवेट सेक्टर में सुस्ती का मतलब है रोजगार के कम अवसर और आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार। निवेशक अर्थव्यवस्था की रीढ़ होते हैं, उनके निवेश से ही नए कारोबार खुलते हैं और रोजगार पैदा होते हैं। प्राइवेट क्षेत्र के संघर्ष का सीधा असर शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है, जो कि हम पिछले कुछ वर्षो में पहले ही देख चुके है कि प्राइवेट कंपनियों से सरकारी कंपनियों की तुलना में निवेशकों को कैसा रिटर्न दिया है।

भविष्य की बातें

ब्लूमबर्ग का कहना है कि यह रणनीति, भारत की अर्थव्यवस्था को सनसेट इंडस्ट्रीज से निकालकर आधुनिक बनाने में सक्षम नहीं होगी। न ही यह प्रोडक्टिविटी बढ़ाएगी। अगर आसान शब्दों में कहें तो यह आर्थिक रूप से टिकाऊ नहीं है। हर केंद्रीय बजट में सरकारी निवेश बढ़ा है इसलिए सरकार को एक अलग रणनीति अपनानी चाहिए क्योंकि सरकारी कंपनियां आधुनिक और प्रोडक्टिव अर्थव्यवस्था का आधार नहीं हो सकतीं हैं।

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*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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