भारत एनर्जी परिवर्तन के एक अहम दौर से गुजर रहा है, जहाँ फोकस केवल रिन्यूएबल कैपेसिटी बढ़ाने पर नहीं, बल्कि डीकार्बोनाइजेशन के लिए नए विकल्प विकसित करने पर है। सोलर और विंड में तेज़ प्रगति के बाद अब ध्यान ग्रीन हाइड्रोजन पर है, जिसे भारत अपनी क्लीन एनर्जी स्ट्रैटेजी का केंद्रीय स्तंभ बना रहा है।
भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है और 2030 तक 500 GW नॉन-फॉसिल फ्यूल आधारित कैपेसिटी स्थापित करने की प्रतिबद्धता जताई है। इस दिशा में ग्रीन हाइड्रोजन इंडस्ट्रियल सेक्टर्स जैसे स्टील, रिफाइनिंग और फर्टिलाइज़र के लिए कार्बन फ्री विकल्प के रूप में उभर रहा है।
क्या है मामला?
ग्रीन हाइड्रोजन वह हाइड्रोजन है जिसे रिन्यूएबल एनर्जी से चलने वाले इलेक्ट्रोलाइज़र के माध्यम से पानी को तोड़कर तैयार किया जाता है। इसमें कार्बन उत्सर्जन लगभग शून्य होता है, इसलिए इसे क्लीन फ्यूल माना जाता है।
नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन का लक्ष्य 2030 तक 5 मिलियन मीट्रिक टन (MMT) प्रतिवर्ष ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता स्थापित करना है। इसके साथ, सरकार को उम्मीद है कि इस मिशन से ₹8 लाख करोड़ से अधिक का निवेश आकर्षित होगा और 6 लाख से ज्यादा रोजगार के अवसर बनेंगे।
इसके साथ ही, हाल ही में भारत ने ग्रीन हाइड्रोजन टेंडर में अब तक की सबसे कम कीमत दर्ज की है, जो लगभग ₹279 प्रति किलोग्राम के आसपास रही। यह संकेत देता है कि स्केल और टेक्नोलॉजी में सुधार के साथ लागत तेजी से घट रही है।
पॉलिसी सपोर्ट
भारत ने 2023 में नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य 2030 तक हर साल 5 मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन करना है। इस मिशन के लिए ₹19,744 करोड़ (लगभग US$ 2.2 बिलियन) का बजट निर्धारित किया गया है और इसका नेतृत्व मिनिस्ट्री ऑफ न्यू एंड रिन्यूएबल एनर्जी कर रही है। यह पहल केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत को ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धी बनाने की रणनीति का हिस्सा है।
मिशन का एक प्रमुख स्तंभ है SIGHT (Strategic Interventions for Green Hydrogen Transition) स्कीम। इसके तहत ₹17,490 करोड़ (लगभग US$ 1.94 बिलियन) तक के इंसेंटिव इलेक्ट्रोलाइज़र मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन हाइड्रोजन प्रोडक्शन के लिए दिए जा रहे हैं। इस स्कीम में रिलायंस, अडानी, L&T और जिंदल जैसे बड़े कॉरपोरेट ग्रुप पहले ही शामिल हो चुके हैं और इलेक्ट्रोलाइज़र हब तथा फैक्ट्रियों के निर्माण की दिशा में काम कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि यह पहल केवल नीति स्तर पर नहीं, बल्कि जमीन पर भी आकार ले रही है।
इसके मिशन के तहत, 2025 तक 3,000 मेगावाट प्रति वर्ष इलेक्ट्रोलाइज़र मैन्युफैक्चरिंग क्षमता, 8.62 लाख टन वार्षिक ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन और 7.24 लाख टन ग्रीन अमोनिया उत्पादन के लिए प्रोजेक्ट्स अवॉर्ड की जा चुकी हैं। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत क्लीन एनर्जी की दिशा में ठोस और तेज़ कदम बढ़ा रहा है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
ग्रीन हाइड्रोजन वैल्यू चेन कई लेयर्स में निवेश अवसर प्रदान करती है। इलेक्ट्रोलाइज़र मैन्युफैक्चरिंग, रिन्यूएबल एनर्जी डेवलपमेंट, ग्रीन अमोनिया प्लांट, स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर और पोर्ट लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में कैपेक्स बढ़ने की संभावना है।
₹8 लाख करोड़ से अधिक संभावित निवेश और 6 लाख रोजगार सृजन का अनुमान इस सेक्टर की स्केल को दर्शाता है। जैसे-जैसे टेंडर में प्राइस ₹279 प्रति किलोग्राम तक आई हैं, वैल्यू चेन में कॉस्ट एफिशिएंसी बढ़ने से कंपनियों के मार्जिन में सुधार की संभावना बनती है।
लॉन्ग टर्म में यह सेक्टर उन निवेशकों के लिए आकर्षक हो सकता है जो क्लाइमेट ट्रांजिशन और एनर्जी सिक्योरिटी थीम पर भरोसा रखते हैं। हालांकि, टेक्नोलॉजी रिस्क और पॉलिसी एग्जीक्यूशन पर नजर रखना जरूरी रहेगा।
भविष्य की बातें
2030 तक 5 MMT उत्पादन क्षमता और 125 GW अतिरिक्त रिन्यूएबल एनर्जी का लक्ष्य भारत की एनर्जी तस्वीर बदल सकता है। यदि उत्पादन लागत ग्लोबल स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनती है, तो भारत एशिया और यूरोप के लिए प्रमुख सप्लायर बन सकता है।
ग्रीन हाइड्रोजन स्टील, सीमेंट और हेवी ट्रांसपोर्ट जैसे हार्ड-टू-अबेट सेक्टर्स में डीकार्बोनाइजेशन का रास्ता खोल सकता है। इससे भारत की नेट जीरो यात्रा को गति मिलेगी।
आने वाले वर्षों में टेक्नोलॉजी इनोवेशन, स्केल और इंटरनेशनल सहयोग इस सेक्टर की दिशा तय करेंगे। यदि पॉलिसी सपोर्ट और निवेश फ्लो जारी रहता है, तो ग्रीन हाइड्रोजन भारत की रिन्यूएबल एनर्जी कहानी का अगला बड़ा अध्याय बन सकता है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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