तमिलनाडु: शहरी और ग्रामीण खर्च में अंतर क्यों?

तमिलनाडु: शहरी और ग्रामीण खर्च में अंतर क्यों?
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तमिलनाडु में खर्च असमानता कम करने में क्या राज है? शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक बदलावों की भूमिका जानिए।

तमिलनाडु: शहरी और ग्रामीण खर्च में अंतर क्यों?

तमिलनाडु राज्य ने हाल ही में अपने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच खर्च के अंतर को कम करने में बेहतरीन प्रगति की है। यह उपलब्धि न केवल राज्य के आर्थिक संतुलन को दर्शाती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि कैसे समृद्धि को समान रूप से सम्पूर्ण राज्य में वितरित किया जा सकता है।

आइए जानें इस बदलाव के पीछे की असली कहानी और इसके प्रभाव।

क्या है मामला?

तमिलनाडु ने हाल ही में अपने शहरी और ग्रामीण खर्च के आंकड़ों में एक महत्वपूर्ण बदलाव देखा है। इस बदलाव के पीछे राज्य सरकार की योजनाएं और पॉलिसी का अहम् योगदान हैं, जिन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में भी विकास को प्राथमिकता दी है।

हाल ही में जारी, ‘पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23’ (HCES) रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति खर्च (औसत कंजम्पशन) के मामले में तमिलनाडु सबसे आगे चलने वाले कुछ राज्यों में से एक है।

अक्सर देखा जाता है कि शहरों में रहने का खर्च गांवों की तुलना में ज्यादा होता है। लेकिन तमिलनाडु में यह अंतर कम है। हालांकि शहरी क्षेत्रों में औसत खर्च ₹7,630 और ग्रामीण इलाकों में ₹5,310 है, यह नेशनल औसत से काफी अधिक है। इतना ही नहीं, शहरी-ग्रामीण खर्च के मामले में तमिलनाडु का अंतर 44% है, जबकि नेशनल औसत 71% है। यह आंकड़ा बताता है कि राज्य में समृद्धि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में फैली हुई है।

तमिलनाडु ने शहरी और ग्रामीण खर्च में अंतर को कैसे घटाया?

भारत के मुकाबले तमिलनाडु में खपत असमानता कम क्यों है, आइए जानते हैं उसके कुछ कारण:

ग्रामीण विकास योजनाएं: तमिलनाडु सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सुविधाओं पर विशेष ध्यान दिया है। इसके लिए राज्य ने कई योजनाएं चलाई हैं, जैसे कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाना और बेसिक इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास करना।

सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को बढ़ावा: तमिलनाडु ने ग्रामीण क्षेत्रों में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों (MSMEs) को बढ़ावा देने के लिए विशेष योजनाएं शुरू की हैं, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़े हैं और आर्थिक समृद्धि आई है ।

कम निर्भरता कृषि पर: राष्ट्रीय औसत 48% के मुकाबले तमिलनाडु में सिर्फ 35% कार्यबल ही कृषि क्षेत्र में कार्यरत।

क्या यह राष्ट्रीय स्तर पर भी हो रहा है?

हाल ही में जारी किए गए पारिवारिक उपभोग व्यय सर्वेक्षण 2022-23 (HCES) के आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि शहरों और गांवों के बीच खर्च का अंतर कम हो रहा है। इसके साथ ही ग्रामीण भारत में औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय (MPCE) ₹3,773 था, जबकि शहरी भारत में यह ₹6,459 था। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में खर्च ग्रामीण क्षेत्रों से 71% अधिक है, लेकिन यह आंकड़ा पहले के सर्वे के मुकाबले कम है। उदाहरण के लिए, 2004-05 में शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच खर्च का अंतर 90% से भी ज्यादा था।

2022-23 के दौरान भारतीय राज्यों के औसत मासिक प्रति व्यक्ति

यह 2022-23 के दौरान भारतीय राज्यों के औसत मासिक प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय को दर्शाता है।

हालांकि, खर्च करने की क्षमता में अभी भी असमानता बनी हुई है, खासकर शहरों में। वहां सबसे ज्यादा कमाई करने वाले 5% लोगों का खर्च सबसे कम कमाई करने वाले 5% लोगों से 10.4 गुना ज्यादा है। वहीं, गांवों में यह अंतर 7.6 गुना है।

यह आंकड़े बताते हैं कि भले ही शहरों और गांवों के बीच खर्च का फासला कम हो रहा है, लेकिन गरीबी और आर्थिक असमानता से पूरी तरह पार पाना अभी भी बाकी है।

ग्रामीण भारत में बदलती खाने की आदतें

पिछले दो दशकों में भारतीय गांवों में खाने-पीने की आदतों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। आंकड़ों के मुताबिक, 1999-2000 में गांवों में कुल खर्च का 22.16% अनाज (गेहूं, चावल आदि) पर होता था, यह आंकड़ा साल दर साल कम होता गया और 2022-23 में घटकर सिर्फ 6.90% रह गया।

दूसरी तरफ, गांवों में सब्जियों, प्रोसेस्ड फ़ूड, फलों और मेवों का खर्च काफी बढ़ गया है। सब्जियों पर खर्च 1999-2000 के 6.17% से घटकर 2022-23 में 5.26% हुआ है। इसी तरह ताजे फलों पर खर्च 1.42% से 2.48% और सूखे मेवों पर खर्च 0.30% से 1.15% तक बढ़ गया है। प्रोसेस्ड फ़ूड, बेवरेज आदि का खर्च भी 1999-2000 के 4.19% से बढ़कर 2022-23 में 9.41% हो गया है।

भविष्य की बातें

तमिलनाडु का यह कदम एक उदाहरण है कि कैसे अन्य राज्य भी अपने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच आर्थिक असमानता को कम कर सकते हैं। भविष्य में, हमें उम्मीद है कि तमिलनाडु की तर्ज पर अन्य राज्य भी अपने ग्रामीण क्षेत्रों में निवेश करेंगे और वहां की आर्थिक स्थिति को सुधारेंगे। इससे न केवल राज्य का, बल्कि देश का भी समग्र विकास होगा।

इस तरह के कदमों से भारत का आर्थिक विकास और भी मजबूत होगा, और देश के विभिन्न हिस्सों में संतुलित विकास देखने को मिलेगा।

आज के लिए सिर्फ इतना ही है। उम्मीद करते है यह जानकारी आपको रोचक लगी होगी। इसे अपने दोस्तों के साथ शेयर करना न भूले।

*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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