आज के दौर में वित्तीय तनाव का एक बड़ा कारण हेल्थ सर्विसेज की बढ़ती लागत है, जिसे ‘मेडिकल इन्फ्लेशन एंग्जायटी’ कहा जा सकता है। यह एक ऐसी चिंता है जो अक्सर चुपचाप पनपती है, लेकिन इसका असर तब महसूस होता है जब कोई मेडिकल इमरजेंसी सामने आती है। भारत में मेडिकल इन्फ्लेशन की दर सामान्य इन्फ्लेशन की तुलना में चिंताजनक रूप से अधिक है। यह न केवल इलाज के खर्च को बढ़ा रही है, बल्कि भविष्य की बचत को भी खतरे में डाल रही है। एक्सपर्ट्स और इंश्योरेंस कंपनियों के अनुसार, हेल्थकेयर की लागत में हो रही यह वृद्धि अब केवल आर्थिक आंकड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आम परिवारों के मानसिक सुकून को भी प्रभावित कर रही है।
आइए मेडिकल इन्फ्लेशन एंग्जायटी के प्रभाव और इसके समाधान को समझें।
भारत में मेडिकल इन्फ्लेशन की मौजूदा स्थिति
भारत में हेल्थ सर्विसेज की लागत तेज़ी से बढ़ रही है, और मेडिकल इन्फ्लेशन वर्तमान में 14% तक पहुँच चुका है जो एशिया में सबसे अधिक है। क्षेत्रीय तुलना देखें तो भारत 14%, चीन 12%, इंडोनेशिया और वियतनाम 10%, और फिलिपींस 9% पर है जो स्पष्ट करता है कि मेडिकल महंगाई के मामले में भारत सबसे आगे है। सामान्य महंगाई भले ही सिंगल डिजिट में रहती हो, लेकिन मेडिकल सेक्टर की यह ड्यूल डिजिट वृद्धि इलाज और अस्पताल सेवाओं को लगातार महंगा बना रही है, जिससे आम लोगों पर बढ़ता आर्थिक दबाव साफ दिखाई देता है।
ACKO के अनुसार, मेडिकल इन्फ्लेशन का असर केवल अस्पताल बिलों तक सीमित नहीं है। इंश्योरेंस होने के बावजूद लोगों के आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च बढ़ रहे हैं, जबकि इंश्योरेंस कंपनियां बढ़ते क्लेम और प्रीमियम लागत को संतुलित करने में चुनौतियों का सामना कर रही हैं। यह स्थिति बताती है कि स्वास्थ्य खर्च भविष्य में और बढ़ सकता है, जिससे समय रहते सही स्वास्थ्य सुरक्षा योजना बनाना बेहद जरूरी हो गया है।
इलाज महंगा होने के पीछे के मुख्य कारण
हेल्थ सर्विसेज की लागत में इस भारी उछाल के पीछे कई फैक्टर्स जिम्मेदार हैं। मेडिकल क्षेत्र में तकनीकी प्रगति ने इलाज को बेहतर तो बनाया है, लेकिन इसे महंगा भी कर दिया है। रोबोटिक सर्जरी, एडवांस डायग्नोस्टिक्स और आधुनिक दवाओं की लागत बहुत अधिक होती है। इसके अलावा, भारत मेडिकल उपकरणों के लिए काफी हद तक आयात पर निर्भर है, जिससे इलाज का खर्च और बढ़ जाता है। अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर और प्रशासनिक खर्चों में वृद्धि भी रोगी के बिल में जुड़ जाती है। संक्रामक रोगों के बाद अब जीवनशैली से जुड़े (जैसे डायबिटीज और हाइपरटेंशन) के मामलों में वृद्धि ने भी बार-बार डॉक्टर के पास जाने और लंबी अवधि की दवाओं की आवश्यकता को बढ़ा दिया है, जो संचयी रूप से खर्च को बढ़ाते हैं।
हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर पड़ता सीधा असर
मेडिकल इन्फ्लेशन का सीधा असर हेल्थ इंश्योरेंस प्रीमियम पर साफ़ तौर पर दिखाई दे रहा है। महंगे इलाज, दवाइयों की बढ़ती प्राइस और अस्पतालों की ऑपरेशनल लागत बढ़ने के कारण इंश्योरेंस कंपनियों को पहले की तुलना में अधिक क्लेम का भुगतान करना पड़ रहा है। इस बढ़ते क्लेम बोझ को संभालने के लिए इंश्योरेंसकर्ता प्रीमियम में लगातार बढ़ोतरी कर रहे हैं, जिससे पॉलिसीधारकों को हर रिन्यूअल पर अधिक राशि चुकानी पड़ रही है।
CNBC-TV18 के अनुसार, मेडी असिस्ट (Medi Assist) के CEO सतीश गिदुगु ने कहा है कि हेल्थ सर्विसेज की लागत चिंताजनक गति से बढ़ रही है, जिसका सीधा वित्तीय दबाव औसत भारतीय परिवार पर पड़ रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि आज भी कई परिवार इलाज का खर्च अपनी जेब से उठाने को मजबूर हैं और मेडिकल इमरजेंसी के समय बचत या कर्ज का सहारा लेते हैं। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि मेडिकल इन्फ्लेशन केवल इंश्योरेंस प्रीमियम की समस्या नहीं है, बल्कि भारत में हेल्थ खर्च से जुड़ी एक गहरी और बढ़ती चुनौती बन चुका है।
इस वित्तीय चिंता से कैसे निपटें?
जल्दी शुरुआत करें: हेल्थ और टर्म इंश्योरेंस प्लान कम उम्र में ही ले लेना चाहिए ताकि प्रीमियम किफायती बना रहे।
पर्याप्त कवरेज: 14% की मेडिकल इन्फ्लेशन दर को देखते हुए, यह सुनिश्चित करें कि आपका सम इंश्योर्ड (Sum Insured) भविष्य की जरूरतों के लिए पर्याप्त हो। एक साधारण पॉलिसी शायद 5-10 साल बाद की लागतों को कवर करने के लिए काफी न हो।
प्लानिंग टूल्स का उपयोग करें: इंश्योरेंस कैलकुलेटर और अन्य टूल्स का उपयोग करें ताकि आप अपने बजट के अनुसार एक ऐसी योजना बना सकें जो आपको और आपके परिवार को मानसिक शांति प्रदान करे।
मेडिकल इन्फ्लेशन एक वास्तविकता है जिसे नकारा नहीं जा सकता। सतर्क रहकर और सही वित्तीय निर्णय लेकर ही हम अपनी बचत को इस अदृश्य महंगाई से सुरक्षित रख सकते हैं।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर