भारत ने 2025 में रेयर अर्थ मैग्नेट्स को लेकर एक बड़ा और रणनीतिक कदम उठाया है। केंद्र सरकार ने लगभग ₹7,000 करोड़ की योजना लॉन्च की है, जिसका उद्देश्य देश में रेयर अर्थ मैग्नेट्स के निर्माण को बढ़ावा देना और चीन पर निर्भरता को कम करना है। यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब ग्लोबल स्तर पर सप्लाई चेन में अनिश्चितता बढ़ी है और चीन द्वारा रेयर अर्थ निर्यात पर लगाए गए प्रतिबंधों ने ऑटो, इलेक्ट्रिक व्हीकल (EV) और डिफेंस जैसे सेक्टर्स को चिंता में डाल दिया है।
आइए भारत सरकार की इस पहल को समझें और जानें किन सेक्टर्स को फायदा मिलने की उम्मीद है।
क्या है मामला?
सरकार ने 27 दिसंबर 2025 को सिंटर्ड रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने की योजना को मंजूरी दी है, जिसके लिए ₹7,280 करोड़ का वित्तीय प्रावधान किया गया है। इस योजना का उद्देश्य भारत में 6,000 मीट्रिक टन प्रति वर्ष (MTPA) की इंटीग्रेटेड REPM मैन्युफैक्चरिंग क्षमता विकसित करना है, जिसमें रेयर अर्थ ऑक्साइड्स से लेकर तैयार मैग्नेट्स तक पूरी वैल्यू चेन शामिल होगी।
डोमेस्टिक स्तर पर यह इंटीग्रेटेड इकोसिस्टम तैयार कर सरकार इलेक्ट्रिक व्हीकल्स, रिन्यूएबल एनर्जी, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और डिफेंस जैसे रणनीतिक सेक्टर्स के लिए एक अहम इनपुट में आत्मनिर्भरता बढ़ाना चाहती है। साथ ही, यह पहल भारत को ग्लोबल REPM मार्केट में एक मजबूत प्लेयर के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी काम करेगी। यह योजना आत्मनिर्भर भारत, रणनीतिक सप्लाई चेन की मजबूती और देश के नेट जीरो 2070 के लॉन्गटर्म लक्ष्य के अनुरूप मानी जा रही है।
भारत के पास संसाधन, फिर भी पीछे क्यों?
भारत के पास लगभग 6.9 मिलियन टन रेयर अर्थ ऑक्साइड (REO) के रिज़र्व हैं, जिससे वह चीन (44 मिलियन टन) और ब्राज़ील (21 मिलियन टन) के बाद दुनिया में तीसरे स्थान पर आता है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया (5.7 मिलियन टन), रूस (3.8 मिलियन टन), वियतनाम (3.5 मिलियन टन) और अमेरिका (1.9 मिलियन टन) जैसे देशों के पास भी उल्लेखनीय रिज़र्व हैं। ग्लोबल स्तर पर देखें तो भारत की हिस्सेदारी कुल ज्ञात रेयर अर्थ रिज़र्व्स में करीब 6-7% है, जो थेओरोटिकल रूप से उसे प्रमुख ग्लोबल सप्लायर्स में शामिल करने के लिए पर्याप्त मानी जाती है।
लेकिन कागज़ों पर मजबूत स्थिति होने के बावजूद, ज़मीनी हकीकत अलग है। भारत में अब तक रेयर अर्थ सेक्टर में प्राइवेट भागीदारी सीमित रही है और वैल्यू चेन का बड़ा हिस्सा विकसित नहीं हो पाया। इसी वजह से रॉ संसाधन मौजूद होने के बावजूद देश मैग्नेट जैसे हाई-वैल्यू प्रोडक्ट्स के लिए आयात पर निर्भर रहा। सरकार की नई ₹7,000 करोड़ की योजना इसी अंतर को पाटने की कोशिश है, ताकि माइनिंग से लेकर मैग्नेट मैन्युफैक्चरिंग तक पूरी वैल्यू चेन देश के भीतर विकसित की जा सके।
चीन की पकड़ और भारत की बढ़ती निर्भरता
चीन द्वारा रेयर अर्थ निर्यात नियमों में ढील का समय भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। ICRA की नवंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, भारत अपनी 80-85% रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) जरूरतों के लिए चीन पर निर्भर है। FY2022 के बाद इलेक्ट्रिक व्हीकल्स (EV) और रिन्यूएबल एनर्जी प्रोजेक्ट्स में तेज़ बढ़ोतरी के कारण इन मैग्नेट्स की डिमांड तेजी से बढ़ी है। सप्लाई को डाइवर्सिफाइड बनाने के प्रयासों के बावजूद, भारत की इंडस्ट्रियल गतिविधियां अब भी काफी हद तक चीन से होने वाले आयात पर टिकी हुई हैं।
ग्लोबल स्तर पर भी चीन की स्थिति बेहद मजबूत है। आंकड़ों के मुताबिक, चीन दुनिया के 69% रेयर अर्थ प्रोडक्शन, 90% प्रोसेसिंग क्षमता और 49% ग्लोबल रिज़र्व्स को नियंत्रित करता है। यही वजह है कि जब तक ठोस और सस्टेनेबल वैकल्पिक सप्लाई स्रोत विकसित नहीं होते, तब तक रेयर अर्थ मार्केट पर चीन का प्रभाव आने वाले कई दशकों तक बना रह सकता है।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
इस योजना का सीधा असर उन कंपनियों पर पड़ सकता है जो EV, ऑटो कंपोनेंट्स, रिन्यूएबल एनर्जी और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग से जुड़ी हैं। सरकार का फोकस डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग और सप्लाई चेन रेज़िलिएंस पर है, जिससे लॉन्ग टर्म में इस सेक्टर में निवेश और कैपेक्स बढ़ सकता है।
हालांकि, यह एक कैपिटल-इंटेंसिव और टेक्नोलॉजी-ड्रिवन सेक्टर है, जहां रिटर्न धीरे-धीरे सामने आते हैं। निवेशकों के लिए यह समझना जरूरी है कि यह स्कीम शॉर्ट टर्म गेन से ज्यादा स्ट्रैटेजिक और लॉन्ग टर्म दृष्टिकोण पर आधारित है।
भविष्य की बातें
भारत सरकार ने ₹7,280 करोड़ की योजना शुरू की है, जिसका उद्देश्य देश में रेयर अर्थ परमानेंट मैग्नेट (REPM) मैन्युफैक्चरिंग को स्वदेशी बनाना है। इस पहल के तहत पहली बार भारत में रेयर अर्थ ऑक्साइड्स से लेकर तैयार मैग्नेट्स तक की इंटीग्रेटेड वैल्यू चेन विकसित की जाएगी, जिससे EV, रिन्यूएबल एनर्जी और डिफेंस सेक्टर की सप्लाई सुरक्षित हो सकेगी।
योजना के तहत 6,000 MTPA की डोमेस्टिक उत्पादन क्षमता तैयार करने का लक्ष्य है, जिससे 2030 तक देश की 70–75% जरूरतें स्थानीय स्तर पर पूरी होने और आयात निर्भरता 100% से घटकर 25–30% तक आने की उम्मीद है। इसके साथ ही, प्रतिस्पर्धी बिड्स के जरिए चुने गए पांच लाभार्थियों से निवेश और रोजगार सृजन को बढ़ावा मिलेगा।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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