भारत और चीन के बीच बढ़ता व्यापारिक घाटा देश की आर्थिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बनकर सामने आया है। चिंता की सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन के साथ हमारा ट्रेड डेफिसिट 100 बिलियन डॉलर के बहुत बड़े आंकड़े तक पहुँच गया है। आसान शब्दों में इसका मतलब है कि हम चीन से जितना सामान खरीदते हैं, उसकी तुलना में उन्हें बहुत कम सामान बेच पाते हैं।
एक्सपर्ट्स, जैसे कि ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI), ने इस स्थिति को लेकर चेतावनी दी है और कहा है कि हमें इस पर गंभीरता से ध्यान देने की ज़रूरत है। आइए, इस पूरे मामले को सरल भाषा में समझते हैं।
क्या है मामला?
भारत-चीन व्यापार असंतुलन चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है। 2024-25 में भारत का चीन के साथ ट्रेड डेफिसिट रिकॉर्ड $99.2 बिलियन तक बढ़ गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में भारत का चीन से आयात 113.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया।

भारत-चीन ट्रेड डेफिसिट 100 बिलियन डॉलर के करीब है, जो आयात-निर्यात के अंतर को स्पष्ट दर्शाता है।
इसके विपरीत, भारत का निर्यात केवल 14.3 बिलियन डॉलर का रहा, जो पिछले वर्ष की तुलना में 14.5% की गिरावट दिखाता है। जिसमें लौह अयस्क (Iron Ore) का निर्यात लगभग आधा रह गया, जबकि मसाले और ऑर्गेनिक केमिकल्स जैसे प्रोडक्ट्स का योगदान सीमित ही रहा।
इसके अलावा, द्विपक्षीय व्यापार 127.7 बिलियन डॉलर का है, जहां चीन अमेरिका के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक पार्टनर है।
भारत चीन पर कितना निर्भर है?
GTRI की रिपोर्ट के मुताबिक़, भारत की ज़रूरी आवश्यकताओं में से 70% से अधिक हिस्से की सप्लाई चीन से आती है, जो हमारे आर्थिक स्ट्रक्चर में गंभीर असंतुलन की ओर इशारा करती है।
आंकड़ों के अनुसार, भारत के टेलीकॉम और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात में चीन की हिस्सेदारी 57.2% है। मशीनरी और हार्डवेयर में यह हिस्सा 44% तक पहुंच जाता है, जबकि केमिकल्स और फ़ार्मास्युटिकल्स में चीन का योगदान 28.3% है।

क्रिएटिव में शामिल सभी प्रोडक्ट्स/ क्षेत्र की चीन पर भारत की निर्भरता 50% से अधिक है, जो कि चिंता का विषय है।
केवल इंडस्ट्री ही नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की वस्तुएं जैसे कढ़ाई मशीनरी और विस्कोस यार्न भी बड़े पैमाने पर चीन से आयात की जाती हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि द्विपक्षीय व्यापार में भारत का हिस्सा दो दशक पहले के 42.3% से गिरकर केवल 11.2% रह गया है।
इसके साथ ही, लो-टेक कंज़्यूमर गुड्स जैसे सिरेमिक टाइल्स, प्लास्टिक फर्नीचर, लाइटिंग प्रोडक्ट्स और यहां तक कि हेडगियर का आयात भी 150% से अधिक बढ़ा है।
सरकारी पहल और आत्मनिर्भरता के प्रयास
भारत सरकार ने आयात पर निर्भरता घटाने और डोमेस्टिक सेल उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 18,100 करोड़ रुपये की PLI स्कीम मंजूर की है। इसका लक्ष्य 50 GWh ACC क्षमता विकसित करना है, जिसमें से 40 GWh पहले ही हुंडई ग्लोबल मोटर्स, ओला इलेक्ट्रिक, राजेश एक्सपोर्ट्स और रिलायंस न्यू एनर्जी सोलर को दी जा चुकी है। यह क्षमता ई-व्हीकल्स, एनर्जी स्टोरेज, इलेक्ट्रॉनिक्स, रेलवे और डिफेंस जैसे कई सेक्टर्स में उपयोगी होगी। इस पहल से करीब ₹45,000 करोड़ निवेश का आएगा और भारत का तेल आयात बिल ₹2,00,000 करोड़ तक घटेगा। जबकि, शेष 10 GWh क्षमता पावर सेक्टर में ग्रिड स्केल स्टेशनरी स्टोरेज (GSSS) के लिए सुरक्षित रखी गई है।
इसी कड़ी में, हाल ही में 19 अगस्त 2025 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने सिंगरौली जिले में रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) का बड़ा भंडार मिलने की घोषणा की। उनका कहना है कि यह खोज भारत की चीन पर निर्भरता घटाएगी और राज्य को क्रिटिकल मिनरल्स हब के रूप में स्थापित करेगी।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
निवेशकों के लिए मौजूदा स्थिति मिश्रित संकेत लेकर आती है। एक ओर चीन पर बढ़ती निर्भरता जियोपॉलिटिकल जोखिम बढ़ाती है, वहीं दूसरी ओर सरकारी नीतियां डोमेस्टिक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने में सफल हो रही हैं।
यह केवल ट्रेड इश्यू नहीं, बल्कि एक प्रतिस्पर्धात्मकता संकट है। मौजूदा आंकड़े एक वेक-अप कॉल की तरह हैं कि भारत को अपनी मैन्युफैक्चरिंग कमियों को दूर करना होगा और डीप इंडस्ट्रियल कैपेबिलिटीज में निवेश करना होगा। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो न सिर्फ ट्रेड डेफिसिट बढ़ेगा बल्कि चीन पर निर्भरता भी बढ़ेगी। निवेशकों के लिए यह समय जोखिम और अवसर दोनों को समझकर रणनीतिक निर्णय लेने का है।
भविष्य की बातें
डेक्कन क्रॉनिकल के अनुसार, GTRI के फाउंडर अजय श्रीवास्तव का मानना है कि भारत को चीन पर बढ़ती निर्भरता से बाहर निकलने के लिए दोहरी रणनीति अपनानी होगी। पहली, IITs और CSIR लैब्स के सहयोग से रिवर्स-इंजीनियरिंग प्रोग्राम चलाकर आयातित वस्तुओं को डीकंस्ट्रक्ट किया जाए और उनके ओपन-एक्सेस ब्लूप्रिंट्स तैयार किए जाएं। दूसरी, डीप-टेक मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देकर चिप्स, PCBs, सेंसर और बैटरी जैसे अहम सेक्टर्स में डोमेस्टिक इकोसिस्टम विकसित किया जाए, जिसे हाल ही में घोषित ₹10,000 करोड़ के इनोवेशन फंड से समर्थन मिल सकता है।
उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि भारत को टेलीकॉम, पावर इक्विपमेंट, फिनटेक और लॉजिस्टिक्स जैसे संवेदनशील सेक्टर्स में चीनी निवेश की सख्त स्क्रीनिंग करनी चाहिए, जबकि जापान, ताइवान और यूरोपीय संघ के साथ पार्टनरशिप को गहरा करना होगा।
*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर