भारतीय डिफेंस और एयरोस्पेस: भविष्य और चुनौतियां

भारतीय डिफेंस और एयरोस्पेस: भविष्य और चुनौतियां
Share

भारत की डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री पिछले एक दशक में रणनीतिक सुरक्षा क्षेत्र से निकलकर एक इमर्जिंग मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात आधारित इंडस्ट्री के रूप में विकसित हुई है। आत्मनिर्भर भारत के तहत सरकार का फोकस डोमेस्टिक उत्पादन, आयात पर निर्भरता कम करने और भारत को ग्लोबल डिफेंस सप्लाई चेन का अहम हिस्सा बनाने पर रहा है।

आइए भारतीय डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री की वर्तमान स्थिति, चुनौतियां, प्रोडक्शन एवं निर्यात, सरकारी पहल और भविष्य की संभावनाओं को जानें।

भारतीय डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री की वर्तमान स्थिति

IBEF के अनुसार, FY25 में भारत का कुल डिफेंस प्रोडक्शन ₹1,50,590 करोड़ (US$ 17.57 बिलियन) रहा, जो FY24 के ₹1,27,434 करोड़ की तुलना में लगभग 18% अधिक है। FY20 के स्तर से देखें तो यह लगभग 90% की मजबूत वृद्धि को दर्शाता है। इस प्रोडक्शन में डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (DPSUs) और अन्य PSUs की हिस्सेदारी 77% रही, जबकि प्राइवेट सेक्टर का योगदान 23% तक पहुंच चुका है।

डिफेंस इकोसिस्टम में अब प्लेटफॉर्म इंटीग्रेशन, सिस्टम मैन्युफैक्चरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स, कम्युनिकेशन सिस्टम्स, शिपबिल्डिंग और एयरोस्पेस प्लेटफॉर्म्स जैसे क्षेत्रों में डायवर्सिफिकेशन दिखाई देती है। एयरोस्पेस सेगमेंट में, C-295 ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट एक अहम उदाहरण है, जहां 56 विमानों में से 40 विमानों का निर्माण भारत में किया जा रहा है। यह भारत के लिए केवल मैन्युफैक्चरिंग नहीं बल्कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्किल डेवलपमेंट का भी संकेत है।

भारतीय डिफेंस प्रोडक्शन और निर्यात

भारत का डिफेंस निर्यात ग्रोथ इस सेक्टर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक रहा है। IBEF के आंकड़ों के अनुसार, FY14 में भारत का डिफेंस निर्यात मात्र ₹686 करोड़ (US$ 81.1 मिलियन) था, जो FY25 में बढ़कर ₹23,622 करोड़ (US$ 2.8 बिलियन) तक पहुंच गया। इसमें प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी ₹15,233 करोड़ (US$ 1.8 बिलियन) रही, जबकि DPSUs ने ₹8,389 करोड़ (US$ 992.2 मिलियन) का योगदान दिया।

FY25 में भारत टॉप 25 डिफेंस निर्यात देशों में शामिल रहा। FY26 के पहले छह महीनों (अप्रैल–सितंबर 2025) में ही डिफेंस निर्यात ₹9,131 करोड़ (US$ 1.07 बिलियन) तक पहुंच गया। इंडोनेशिया को ₹3,800 करोड़ (US$ 440.3 मिलियन) का BrahMos मिसाइल सौदा इस बात का संकेत है कि भारत अब हाई-एंड डिफेंस प्रोडक्ट्स का भरोसेमंद निर्यातक बन चुका है।

डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहल

सरकारी नीतियों ने इस सेक्टर की ग्रोथ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यूनियन बजट FY26 में रक्षा मंत्रालय को ₹6,81,000 करोड़ (US$ 78.7 बिलियन) का आवंटन मिला, जो FY25 की तुलना में 9.5% अधिक है। इसमें से ₹1,80,000 करोड़ (US$ 20.8 बिलियन) कैपिटल एक्सपेंडिचर के लिए निर्धारित हैं।

सरकार ने अब तक पाँच सकारात्मक स्वदेशीकरण सूचियाँ जारी की हैं, जिनमें 509 से अधिक डिफेंस आइटम्स को डोमेस्टिक स्तर पर मैन्युफैक्चर करने का प्रावधान है। FDI पॉलिसी में भी सुधार हुआ है, जहां ऑटोमैटिक रूट से 74% और गवर्नमेंट रूट से 100% तक निवेश की अनुमति दी गई है। अप्रैल 2000 से जून 2025 तक डिफेंस सेक्टर में कुल FDI इक्विटी इनफ्लो US$ 21.74 मिलियन रहा है।

इसके अलावा, उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर्स, iDEX, SRIJAN पोर्टल और DRDO का टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड (TDF) स्टार्टअप्स और MSMEs को डिफेंस और एयरोस्पेस इकोसिस्टम से जोड़ने में मदद कर रहे हैं।

डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री में चुनौतियाँ

तेज़ प्रगति के बावजूद, यह इंडस्ट्री कुछ संरचनात्मक चुनौतियों का सामना कर रही है। IBEF के अनुसार, क्रिटिकल टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स और हाई-एंड इंजन जैसे क्षेत्रों में अभी भी आंशिक रूप से आयात पर निर्भरता बनी हुई है। इसके अलावा, डिफेंस R&D का साइकल लंबा होने के कारण प्रोजेक्ट्स के कमर्शियल स्टेज तक पहुंचने में समय लगता है।

FDI पॉलिसी में सुधार के बावजूद, अप्रैल 2000 से जून 2025 तक कुल FDI इनफ्लो US$ 21.74 मिलियन ही रहा, जो सेक्टर की संभावनाओं के रेश्यो में सीमित है। स्किल गैप, ग्लोबल सर्टिफिकेशन और सप्लाई चेन इंटीग्रेशन जैसी चुनौतियाँ भी इंडस्ट्री के लिए महत्वपूर्ण बनी हुई हैं।

स्टॉक्स जिन पर नजर रखनी चाहिए

डिफेंस और एयरोस्पेस इंडस्ट्री का भविष्य

IBEF के अनुसार, सरकार ने FY29 तक भारत के डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग आउटपुट को US$ 34.7 बिलियन और डिफेंस निर्यात को US$ 5.8 बिलियन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। यह भारत को केवल डोमेस्टिक जरूरतों तक सीमित न रखकर एक मजबूत ग्लोबल डिफेंस सप्लायर बनाने की दिशा में अहम कदम है।

एयरोस्पेस सेगमेंट में भारत की भूमिका तेजी से बढ़ी है। जहां पहले भारत केवल सीमित कंपोनेंट सप्लाई तक सीमित था, वहीं अब यह वैल्यू US$ 250 मिलियन से बढ़कर US$ 2 बिलियन हो चुकी है, जिससे भारत ग्लोबल एयरोस्पेस मैन्युफैक्चरिंग में चीन के विकल्प के रूप में उभर रहा है।

इसके साथ ही, अगले 10 वर्षों में एयरोस्पेस और डिफेंस सेक्टर में US$ 223 बिलियन की कैपिटल एक्सपेंडिचर पाइपलाइन है, जबकि मध्यम अवधि में लगभग US$ 130 बिलियन के निवेश की संभावना है। इसी दिशा में, सिविल एविएशन मंत्री किंजरापु राम मोहन नायडू ने बताया कि एयरोस्पेस कंपोनेंट मैन्युफैक्चरिंग मार्केट, जो अभी US$ 2 बिलियन का है, उसे 2030 तक US$ 4 बिलियन तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा गया है।

*आर्टिकल में शामिल कंपनियों के नाम केवल सूचना के उद्देश्य के लिए है। यह निवेश सलाह नहीं है।
*डिस्क्लेमर: तेजी मंदी डिस्क्लेमर

Teji Mandi Multiplier Subscription Fee
Min. Investment

3Y CAGR

Min. Investment

Teji Mandi Flagship Subscription Fee
Min. Investment

3Y CAGR

Min. Investment

Teji Mandi Edge Subscription Fee
Min. Investment

Min. Investment

Teji Mandi Xpress Subscription Fee
Total Calls

Total Calls

Recommended Articles
Scroll to Top