भारतीय अर्थव्यवस्था आज दुनिया भर में अपनी एक नई पहचान बना रही है। हाल ही में, भारत $4.19 ट्रिलियन की GDP के साथ जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। यह एक शानदार उपलब्धि है जो देश की बढ़ती आर्थिक शक्ति को दर्शाती है।
लेकिन इस आर्थिक विकास की कहानी का एक दूसरा पहलू भी है, जो बर्नस्टीन (Bernstein) की एक हालिया रिपोर्ट में सामने आया है। जिसमें बताया गया है कि देश के शीर्ष 1% अमीर लोग भारत की कुल डोमेस्टिक संपत्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा नियंत्रित करते हैं। यह विरोधाभास एक ऐसी तस्वीर पेश करता है जहाँ देश तो अमीर हो रहा है, लेकिन देश की दौलत कुछ ही हाथों में सिमटती जा रही है।
यह आर्टिकल हमें इसी ‘एक देश, दो दुनिया’ की हकीकत को समझने का अवसर देता है।
दुनिया जहाँ बस 1% की आबादी बसती है
US की वेल्थ मैनेजमेंट फर्म बर्नस्टीन की रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले हैं जो बताते हैं कि भारत की शीर्ष 1% आबादी के पास देश की कुल डोमेस्टिक संपत्ति का लगभग 60% हिस्सा है। यह एक बहुत बड़ी संख्या है, जो दर्शाती है कि देश की अधिकांश संपत्ति आबादी के एक बहुत छोटे हिस्से के हाथों में केंद्रित है। भारत की कुल डोमेस्टिक संपत्ति लगभग $19.6 ट्रिलियन डॉलर आंकी गई है, जिसमें से $11.6 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 59%) इसी अमीर वर्ग के पास है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब हम फाइनेंशियल एसेट्स की बात करते हैं, तो यह अंतर और भी गहरा हो जाता है। रिपोर्ट बताती है कि इसी 1% अमीर वर्ग के पास देश के कुल फाइनेंशियल एसेट्स का 70% हिस्सा है। कुल संपत्ति में 60% हिस्सेदारी और वित्तीय संपत्ति में 70% हिस्सेदारी के बीच यह 10 प्रतिशत का अंतर एक महत्वपूर्ण बात की ओर इशारा करता है कि देश के कैपिटल मार्केट और कॉर्पोरेट जगत पर इन कुछ लोगों का प्रभाव उनकी कुल संपत्ति से भी कहीं ज़्यादा है।
अमीरों का असली खजाना: सोना और रियल एस्टेट
भारत के सबसे अमीर लोग अपना 60% पैसा सिर्फ दो चीजों में निवेश करना पसंद करते हैं: रियल एस्टेट और सोना। यह महज़ एक निवेश की नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। सदियों से, भारतीय समाज में सोना और ज़मीन को केवल धन का प्रतीक ही नहीं, बल्कि सुरक्षा और स्थिरता का सबसे बड़ा ज़रिया माना गया है।
आंकड़ों के अनुसार, इस अमीर वर्ग की कुल $11.6 ट्रिलियन की संपत्ति में से केवल $2.7 ट्रिलियन ही सक्रिय रूप से मैनेज किए जाने वाले फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट्स जैसे म्यूचुअल फंड, बीमा, इक्विटी और बैंक जमा में निवेशित है। बाकी बची $8.9 ट्रिलियन की भारी-भरकम राशि नॉन-सर्विसेबल एसेट्स जैसे फिजिकल रियल एस्टेट, सोना, कैश और अनलिस्टेड प्रमोटर इक्विटी में लगी हुई है।
जब तिजोरियों में बंद हो जाए देश की तरक्की
जब देश की 60% संपत्ति सिर्फ 1% लोगों के हाथों में सिमट जाती है, तो इसका असर पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। भले ही भारत दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय (GDP per capita) के मामले में हम अभी भी बहुत पीछे हैं। भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग $2,934 है, जबकि जापान में यह $33,955 और जर्मनी में $55,911 है। यह विशाल अंतर दिखाता है कि देश की कुल GDP का लाभ आम नागरिक तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है।

भारत जापान को पीछे छोड़ते हुए अब 2028 तक जर्मनी से आगे निकलने की राह पर है।
यह एक ऐसा चक्र बनाता है जहाँ अमीर अपनी संपत्ति की वैल्यू में वृद्धि से और अमीर होते जाते हैं, जबकि बाकी लोग पीछे छूट जाते हैं। यह स्थिति देश के शेयर बाज़ार की कहानी को भी बदल देती है। भले ही सेंसेक्स नई ऊंचाइयों को छू रहा हो, लेकिन अगर 70% फाइनेंशियल एसेट्स सिर्फ 1% लोगों के पास है, तो इस तेज़ी का सीधा लाभ देश की अधिकांश आबादी तक नहीं पहुंच पाता है।
इसके अलावा, $8.9 ट्रिलियन जैसी बड़ी राशि गोल्ड और रियल एस्टेट लगा होना एक बहुत बड़ी (अपॉर्चुनिटी) कॉस्ट है। यही पूंजी अगर स्टार्टअप्स, नए इंडस्ट्रीज या इंफ्रास्ट्रक्चर में लगती, तो इससे रोज़गार पैदा होता और आर्थिक विकास को और गति मिलती।
क्या युवा पीढ़ी तोड़ेगी यह परंपरा?
आगे देखते हुए, यह सवाल उठता है कि क्या यह चलन जारी रहेगा? अनुमान के अनुसार, भारत 2028 तक जर्मनी को पछाड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, और तब हमारी GDP $5.7 ट्रिलियन से अधिक हो सकती है। बर्नस्टीन की रिपोर्ट का भी अनुमान है कि भारत में अमीर और अमीर होते जाएंगे। इस अमीर वर्ग में लगभग 35,000 अल्ट्रा-हाई-नेट-वर्थ (UHNI) परिवार हैं, जिनकी कुल संपत्ति $12 मिलियन से अधिक है।
हालांकि, भविष्य में कुछ बदलाव देखने को मिल सकते हैं। जैसे-जैसे अमीरों की नई पीढ़ी, जो ग्लोबल मार्केट्स और नई तकनीक से ज़्यादा परिचित है, कमान संभालेगी, हो सकता है कि उनका झुकाव पारंपरिक सोने और रियल एस्टेट से हटकर ग्लोबल इक्विटी, वेंचर कैपिटल और डिजिटल संपत्ति की ओर बढ़े। यदि ऐसा होता है, तो यह देश की अर्थव्यवस्था में कैपिटल फ्लो को बढ़ा सकता है। लेकिन फिलहाल, यह स्पष्ट है कि भारत की आर्थिक तरक्की की कहानी जितनी प्रभावशाली है उतनी ही जटिल भी है।
लेकिन फिलहाल, बर्नस्टीन की रिपोर्ट एक स्पष्ट संदेश देती है भारत में धन की खाई गहरी है और इसे पाटने के लिए आर्थिक और नीतिगत स्तर पर गंभीर प्रयासों की आवश्यकता होगी।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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