2025 में भारतीय शेयर मार्केट ने ऊपर से देखने पर मजबूत प्रदर्शन दिखाया है। सेंसेक्स, निफ्टी और बैंक निफ्टी जैसे प्रमुख इंडेक्स रिकॉर्ड स्तरों के आसपास या लाइफटाइम हाई तक पहुंचे हैं। हेडलाइन इंडेक्स की इस मजबूती ने यह संकेत दिया कि मार्केट में तेजी बनी हुई है। लेकिन जब निवेशक पोर्टफोलियो की ओर देखते है तो वह लाल निशान में रंगे नजर आ रहे हैं।
लार्जकैप कंपनियों के शेयर्स ने मार्केट को ऊपर खींचा, जबकि मिडकैप और स्मॉलकैप सेगमेंट में दबाव बना रहा। यही वजह है कि इंडेक्स की तेजी और अधिकांश शेयर्स की कमजोरी के बीच एक साफ अंतर दिख रहा है। आइए, आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि आखिर मार्केट में चल क्या रहा है।
क्या है मामला?
दिसंबर 2025 की शुरुआत भारतीय शेयर मार्केट के लिए ऐतिहासिक रही। BSE सेंसेक्स ने 1 दिसंबर 2025 को 86,159.02 पर अब तक का सबसे हाई क्लोज़िंग स्तर दर्ज किया, जो 2024 के पिछले रिकॉर्ड 85,978 के स्तर से ऊपर रहा। इसी तरह निफ्टी 50 भी 1 दिसंबर 2025 को 26,325.80 के स्तर पर पहुंच गया, जो सितंबर 2024 में बने 26,277.35 के अपने पुराने ऑल-टाइम हाई को पार कर गया। ये आंकड़े दिखाते हैं कि हेडलाइन इंडेक्स के स्तर पर मार्केट ने नई ऊंचाइयों को छुआ है।
हालांकि, 2025 की यह तेजी बेहद चयनात्मक रही। मार्केट में बढ़त कुछ गिने-चुने शेयर्स तक सीमित रही, जबकि व्यापक मार्केट दबाव में बना रहा। करीब 90% लिस्टेड शेयर अब भी अपने-अपने 52-वीक हाई से काफी नीचे ट्रेड कर रहे हैं। यह स्थिति तब देखने को मिली जब आयकर और GST दरों में कटौती जैसे सरकारी सपोर्ट और मजबूत डोमेस्टिक निवेश फ्लो मौजूद थे। यानी इंडेक्स की मजबूती के पीछे पूरे मार्केट की समान भागीदारी नहीं थी, बल्कि तेजी सीमित शेयर्स तक सिमटी रही।
स्मॉलकैप और मिडकैप में कमजोरी क्यों दिखी?
2025 में स्मॉलकैप और मिडकैप इंडेक्स का कमजोर प्रदर्शन दरअसल पिछले दो वर्षों की तेज़ रैली के बाद मार्केट के सामान्य होने की प्रक्रिया का हिस्सा रहा। 2024 में BSE स्मॉलकैप इंडेक्स ने 29% से अधिक का रिटर्न दिया था, जबकि मिडकैप इंडेक्स करीब 26% चढ़ा था। यह बढ़त सेंसेक्स से कहीं ज्यादा थी। इतनी तेज़ रैली के कारण कई स्मॉलकैप कंपनियों के वैल्यूएशन काफी हाई स्तर पर पहुंच गए, जबकि उनकी अर्निंग्स में उतनी तेज़ बढ़ोतरी नहीं हो पाई।
2025 में इसी असंतुलन में सुधार देखने को मिला। ग्लोबल अनिश्चितता के माहौल में निवेशकों का रुझान मजबूत बैलेंस शीट और स्थिर अर्निंग्स वाली लार्जकैप कंपनियों की ओर बढ़ा। इसके उलट, स्मॉलकैप और मिडकैप कंपनियां फंडिंग लागत, मार्जिन दबाव और आर्थिक सुस्ती के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं, जिससे उनमें उतार-चढ़ाव बढ़ गया। नतीजतन, निवेशकों की पूंजी ब्लू-चिप शेयर्स की ओर घूमी और व्यापक मार्केट की तुलना में स्मॉल और मिडकैप शेयर पीछे रह गए।
लार्जकैप और स्मॉलकैप का संघर्ष
जहां सेंसेक्स और निफ्टी नई ऊंचाइयों पर हैं, वहीं ब्रॉड मार्केट का हाल इसके बिल्कुल उलट है। पिछले दो सालों (2023 और 2024) में शानदार प्रदर्शन करने वाले स्मॉलकैप और मिडकैप इंडेक्स 2025 में हांफते हुए नजर आए। आंकड़ों पर नजर डालें तो 24 दिसंबर 2025 तक BSE स्मॉलकैप इंडेक्स में 3,686.98 पॉइंट्स की गिरावट आई, जो कि 6.68% की कमी है। यह इंडेक्स अपने 52-सप्ताह के निचले स्तर 41,013.68 तक भी गिर गया था।
वहीं, BSE मिडकैप इंडेक्स का प्रदर्शन सुस्त रहा। इसमें केवल 360.25 पॉइंट्स (0.77%) की मामूली बढ़त देखी गई। यह प्रदर्शन 2023 के मुकाबले बिल्कुल विपरीत है, जब स्मॉलकैप इंडेक्स ने 47% और मिडकैप ने 45% से अधिक की रैली दिखाई थी। 2025 में इन सेक्टर्स का प्रदर्शन काफी कमजोर रहा है, जिसे एनालिस्ट “मार्केट नॉर्मलाइजेशन” का नाम दे रहे हैं।
निवेशकों के लिए इसमें क्या है?
मौजूदा मार्केट की स्थिति निवेशकों के लिए सतर्क रहने का संकेत दे रही है। निफ्टी भले ही रिकॉर्ड स्तर के आसपास बना हुआ है, लेकिन मार्केट में कमजोर बनी हुई है। मनी कंट्रोल के अनुसार, तेजी के माहौल के बावजूद 10 में से 9 शेयर अब भी लाल निशान के साथ ट्रेड कर रहे हैं। इसका साफ मतलब यह है कि इंडेक्स की मजबूती का फायदा पूरे मार्केट को नहीं मिल रहा, बल्कि बढ़त कुछ चुनिंदा शेयर्स तक सीमित है।
हालांकि, 2025 में आए करेक्शन के बाद क्वालिटी स्मॉलकैप और मिडकैप शेयर्स के वैल्यूएशन अपने पीक लेवल की तुलना में ज्यादा संतुलित हो गए हैं, लेकिन जब तक अर्निंग्स में ठोस सुधार नहीं आता, तब तक व्यापक तेजी की उम्मीद कम है। आगे चलकर मार्केट की अगली चाल लिक्विडिटी से ज्यादा फंडामेंटल्स पर आधारित रहने की संभावना है।
भविष्य की बातें
आगे की ओर देखें तो 2026 के लिए शेयर मार्केट की दिशा कुछ अहम फैक्टर्स पर निर्भर करती नजर आती है। बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक, आने वाले समय में मार्केट की चाल का सबसे बड़ा ड्राइवर कॉरपोरेट अर्निंग्स रहने वाली है। यदि कंपनियों की अर्निंग्स में स्थिर और व्यापक सुधार दिखता है, तो मार्केट को ठोस आधार मिल सकता है।
इसके अलावा, केंद्रीय बजट से जुड़ी नीतियां, खासकर कैपेक्स, टैक्सेशन और ग्रोथ सपोर्ट से जुड़े फैसले, निवेशकों की धारणा को प्रभावित करेंगे। विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) के फ्लो भी अहम भूमिका निभाएंगे, क्योंकि ग्लोबल ब्याज दरों और जोखिम भावना में बदलाव का सीधा असर भारतीय मार्केट पर पड़ता है।
कुल मिलाकर, 2026 में मार्केट की अगली रैली लिक्विडिटी के बजाय अर्निंग्स, पॉलिसी सपोर्ट और ग्लोबल संकेतों से संचालित होने की संभावना ज्यादा है।
*यह आर्टिकल केवल जानकारी के उद्देश्य के लिए है। यह कोई निवेश सलाह नहीं है।
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